पंचकूला, नोएडा और आंध्र प्रदेश के स्कूलों में बच्चों से जुड़ी हिंसक घटनाओं ने समाज और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बालक ने केजी में पढ़ने वाली बालिका के साथ जघन्य और कल्पना से परे क्रूरता की। वहीं, नोएडा के एक स्कूल में सात वर्षीय बालक को उसके 15 से अधिक सहपाठियों ने लगभग आधे घंटे तक बुरी तरह पीटा। आंध्र प्रदेश के राप्ताडु के एक स्कूल में दसवीं कक्षा की छात्रा पर भी हिंसक हमला किया गया। इन घटनाओं ने बच्चों में तेजी से बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति के कारणों और इसके पीछे जिम्मेदार परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

प्रो. (डॉ.) मधुमुकुल चतुर्वेदी के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में आया यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि धीरे-धीरे घरों और सामाजिक परिवेश में विकसित हुआ है। एक समय था, जब बच्चा नाराज होने पर किसी कोने में जाकर बैठ जाता था, लेकिन आज गुस्से में मोबाइल पटकना, बड़ों पर हाथ उठाना और दोस्तों के साथ मारपीट करना सामान्य व्यवहार की तरह सामने आने लगा है।

हिंसा का स्वरूप भी पहले की तुलना में बदल गया है। अब इसका मतलब केवल लड़ाई-झगड़े तक सीमित नहीं है। गाली देना, चिल्लाना, चीजें तोड़ना, सोशल मीडिया पर दूसरों को ट्रोल करना, धमकाना, जानवरों को मारना, छोटे बच्चों को पीटना और खुद को नुकसान पहुंचाना भी हिंसक प्रवृत्ति के लक्षण हैं।

बच्चों में बढ़ती इस प्रवृत्ति के पीछे परिवार का बिखराव एक प्रमुख कारण माना गया है। माता-पिता दोनों नौकरी में व्यस्त रहते हैं और बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। कई बार बच्चा समय मांगता है तो उसे मोबाइल थमाकर कह दिया जाता है कि फोन देख लो। इस तरह बच्चों को माता-पिता का साथ और संवाद देने के बजाय स्क्रीन के हवाले कर दिया गया है। परिवार में तलाक, रोजाना होने वाले झगड़े और गाली-गलौज का माहौल भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करता है। बच्चा वही सीखता है, जो वह अपने आसपास होते हुए देखता है। जब उसे प्यार और शांति से बातचीत का माहौल नहीं मिलता तो वह चिल्लाने और आक्रामक व्यवहार करने लगता है।

मोबाइल और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हिंसक सामग्री भी बच्चों की मानसिकता को प्रभावित करने वाला एक कारण है। बच्चे दिन में 5-6 घंटे तक हिंसक वीडियो देखते हैं। रील में मारपीट के दृश्य, वेब सीरीज में खून-खराबा और ऑनलाइन गेम में लगातार गोलीबारी जैसे दृश्य उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन रहे हैं। पब्जी और फ्री फायर जैसे गेम में हत्या को 'किल' कहा जाता है और अधिक किल करने वाले खिलाड़ी को बड़ा हीरो माना जाता है। लगातार ऐसे कंटेंट के संपर्क में रहने से बच्चों के लिए हिंसा सामान्य होती जाती है और उन्हें मारपीट खेल या मजाक जैसी लगने लगती है।

अनुशासन के नाम पर की जाने वाली मारपीट भी बच्चों में हिंसक व्यवहार को बढ़ावा देती है। आज भी अनेक स्कूलों और घरों में 'मार से ही सुधरेगा' की सोच अपनाई जाती है। शिक्षक बच्चे को पीटता है और पिता भी अनुशासन के नाम पर मारपीट करता है। इससे बच्चा यही सीखता है कि ताकतवर व्यक्ति कमजोर को मार सकता है। बाद में वही बच्चा अपने से कमजोर बच्चों के साथ इसी व्यवहार को दोहराता है।

बच्चों की हर जिद पूरी करना और उनकी गलतियों पर भी प्रशंसा करना समस्या को और बढ़ाता है। 'मेरा बेटा किसी से डरता नहीं, मार के आता है' जैसी बातों को बहादुरी समझकर प्रोत्साहित किया जाता है। इससे बच्चों में सहनशीलता और 'ना' सुनने की क्षमता कमजोर पड़ती है। वे अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना नहीं सीख पाते।

स्कूलों में पढ़ाई का बढ़ता दबाव भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। नंबरों की दौड़, दूसरे बच्चों से तुलना और लगातार प्रतिस्पर्धा के कारण बच्चे मानसिक रूप से दबाव महसूस करते हैं। वे अपनी परेशानियों और भावनाओं को भीतर दबाए रखते हैं, जो कई बार गुस्से और आक्रामकता के रूप में सामने आता है।

बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति रोकने के लिए सबसे पहले अभिभावकों को उनके साथ संवाद बढ़ाना होगा। रोजाना 30 मिनट बिना मोबाइल के बच्चों से बातचीत करनी चाहिए। उनसे स्कूल में हुई घटनाओं और गुस्सा आने के कारणों के बारे में पूछना चाहिए। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनी जा रही है तो उनमें अपनी भावनाएं व्यक्त करने की बेहतर क्षमता विकसित होती है।

स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर भी घर में स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत है। भोजन के समय और सोने से एक घंटा पहले किसी भी तरह की स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हिंसक कंटेंट पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिए। बच्चों को गेम में व्यस्त रखने के बजाय मैदान में खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वे शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकें और उनका गुस्सा शांत हो।

अभिभावकों को अपने व्यवहार में भी बदलाव लाना होगा। बच्चों के सामने चिल्लाना, गाली देना, घरेलू सहायकों को डांटना और परिजनों पर गुस्सा करना बंद करना होगा। बच्चे केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि बड़ों के आचरण से सीखते हैं। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि 'सॉरी' और 'थैंक्यू' कहना कमजोरी नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार का हिस्सा है।

स्कूलों में भी केवल गणित और विज्ञान की पढ़ाई तक सीमित रहने के बजाय नैतिक शिक्षा, ध्यान, योग, खेल और कहानियों को महत्व देना होगा। ऐसी काउंसलिंग व्यवस्था होनी चाहिए, जहां बच्चे बिना किसी डर के अपनी भावनाएं और परेशानियां साझा कर सकें।

बच्चों को 'ना' सुनना भी सिखाना जरूरी है। उनकी हर जायज और नाजायज मांग पूरी करना प्यार नहीं, बल्कि उनके व्यवहार के लिए नुकसानदायक हो सकता है। उन्हें संयम, धैर्य और त्याग का महत्व समझाना चाहिए। हार स्वीकार करना, इंतजार करना और अपनी गलती पर माफी मांगना भी जीवन के जरूरी सबक हैं।

इसके साथ ही फिल्मों, धारावाहिकों और सोशल मीडिया पर हिंसक कंटेंट पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाने की जरूरत बताई गई है। बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति केवल स्कूलों की समस्या नहीं, बल्कि परिवार, डिजिटल माध्यमों और सामाजिक व्यवहार से जुड़ा गंभीर विषय है। बच्चों को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए घर और स्कूल दोनों स्तरों पर उनके व्यवहार, भावनाओं और आसपास के माहौल पर ध्यान देना आवश्यक है। अन्यथा आने वाली पीढ़ी कुशाग्र होने के बावजूद संवेदनहीन बन सकती है।

Tags: