तस्वीर में कैलाश नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बैठे श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।   

कैलाश नगर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का शुक्रवार को समापन हुआ। कथा वाचक प्रेम नारायण महाराज ने मनुष्य जीवन को भोगों में लगाने के बजाय भगवान की ओर लगाने और सेवा भाव से जीवन जीने का संदेश दिया।

प्रेम नारायण महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन संसार में फंसने के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा को प्राप्त कर मुक्त होने के लिए मिला है। परिवार की जिम्मेदारियों को भी सेवा भाव से निभाना चाहिए। संसार में रहते हुए मन में ममता भगवान के प्रति रखनी चाहिए और आत्मशांति की ओर बढ़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन भगवान की विशेष कृपा से मिला है। इसका सदुपयोग नहीं करने पर जीव को विभिन्न योनियों में भटकना पड़ सकता है। इसलिए प्रत्येक कार्य भगवान से प्रेम बढ़ाने के भाव से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को पारस मिला है, जो लोहे को सोना बनाने के लिए है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन भी अपने भीतर के परिवर्तन और आत्मज्ञान के लिए मिला है। किसी के प्रति द्वेष या वैर मन में नहीं रखना चाहिए।

महाराज ने कहा कि संसार के प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है। सभी में चेतना और आत्मप्रकाश है, इसलिए सबके भले की भावना रखनी चाहिए। उन्होंने भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा, “हे मेरे नाथ, हे मेरे गोविंद, मुझे इस जीवन में अंत की ओर नहीं, अनंत की ओर लगाना।”

कथा के दौरान भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हुए प्रेम नारायण महाराज ने कहा कि भगवान की कथाओं को शंका की दृष्टि से नहीं, बल्कि श्रद्धा की दृष्टि से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन रूपी नाव में मोह, अहंकार और विकारों के छेद नहीं रखने चाहिए। भजन और भगवान के नाम का जाप कभी नहीं छोड़ना चाहिए। शबरी, नारद और मीराबाई ने अभ्यास और भक्ति के माध्यम से भगवान को पाया। निरंतर नाम स्मरण से मन के भीतर प्रकाश जागृत होता है।

उन्होंने कहा कि भगवान की माया बहुत दुष्कर है, लेकिन प्रभु के नाम का आश्रय लेने से उससे पार पाया जा सकता है। वर्तमान समय का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकता है, क्योंकि भविष्य वर्तमान के कर्मों से बनता है। उन्होंने ‘असतो मा सद्गमय’ का अर्थ बताते हुए असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ने का संदेश दिया।

प्रेम नारायण महाराज ने कहा कि दुख को भी भगवान की कृपा मानना चाहिए। कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण से दुख मांगकर प्रार्थना की थी, क्योंकि दुख में भगवान का स्मरण अधिक होता है। भीष्म पितामह ने भी कष्ट सहा, लेकिन अंतिम समय में भगवान के दर्शन प्राप्त हुए। इसलिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि जीवन के अंतिम समय में भी प्रभु स्वयं संभालें।

उन्होंने कहा कि जैसे धरती एक बीज से अनंत फल देती है, वैसे ही परमात्मा के प्रति प्रेम और नाम जप से जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश बढ़ता है। भोगों से भगवान की ओर बढ़ते हुए निरंतर नाम जप और भजन का अभ्यास करते रहना ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

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