तस्वीर में कोटा के नसियां जी में मुनि श्री योगसागर जी महाराज को आहारदान देते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।

कोटा, 31 अगस्त। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 31 एवं 32 की व्याख्या करते हुए सम्यग्दर्शन की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ज्ञान और चारित्र तभी सार्थक एवं फलदायी होते हैं, जब उनके साथ सम्यक् श्रद्धा जुड़ी हो।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी के कथन का भाव स्पष्ट करते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्र की साधना को सही दिशा प्रदान करने वाला आधार है। मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन को कर्णधार अर्थात् नाविक कहा गया है। जिस प्रकार विशाल समुद्र में नाव को सही दिशा देकर कर्णधार उसे सुरक्षित किनारे तक पहुंचाता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन संसार-सागर में भटकते जीव को मोक्ष की दिशा प्रदान करता है।

मुनिश्री ने कहा कि आज मनुष्य के पास ज्ञान तो बहुत है, लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि उस ज्ञान की दिशा क्या है। केवल बहुत कुछ जान लेना ही ज्ञान की पूर्णता नहीं है। जब तक सत्य के प्रति सही श्रद्धा और वस्तु के वास्तविक स्वरूप का यथार्थ विश्वास नहीं होगा, तब तक ज्ञान आत्मकल्याण की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएगा।

उन्होंने सम्यग्दर्शन को धर्म का बीज बताते हुए कहा कि जिस प्रकार बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलप्राप्ति संभव नहीं है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान और चारित्र की वास्तविक उत्पत्ति, वृद्धि और फलप्राप्ति नहीं हो सकती। यदि सम्यग्दर्शन का बीज मजबूत है तो उससे सम्यग्ज्ञान का विकास होगा, सम्यक् चारित्र पुष्ट होगा और अंततः मोक्षरूपी परम फल की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।

मुनि श्री ने कहा कि हम धर्म के बाहरी स्वरूप पर अधिक ध्यान देते हैं—कितनी पूजा की, कितने पाठ किए, कितने उपवास किए और कितनी बार मंदिर गए। लेकिन इससे पहले यह देखना चाहिए कि हमारी श्रद्धा कैसी है, हमारी दृष्टि कैसी है और क्या हम आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास कर रहे हैं।

मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन के बिना प्राप्त ज्ञान अहंकार को बढ़ा सकता है और सम्यक् भावना के अभाव में चारित्र केवल बाहरी प्रदर्शन बन सकता है। इसलिए जीवन में सबसे पहले दृष्टि को निर्मल करना आवश्यक है। जब दृष्टि बदलती है तो ज्ञान की दिशा बदलती है और जब ज्ञान की दिशा बदलती है, तब जीवन का आचरण भी बदलने लगता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसान भूमि की कितनी भी सेवा करे, पानी और खाद डाले, लेकिन यदि बीज ही नहीं है तो वृक्ष कैसे उत्पन्न होगा। इसी प्रकार ज्ञान और चारित्र के अनेक प्रयास करने के बाद भी यदि सम्यग्दर्शन का बीज जीवन में नहीं है तो आत्मकल्याण का वास्तविक फल प्राप्त करना कठिन है।

मुनि श्री ने कहा कि मोक्ष की यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने वाली यात्रा है। मंदिर में भगवान के दर्शन करना अत्यंत शुभ है, लेकिन भगवान के वीतराग स्वरूप को समझकर उसी दिशा में अपने जीवन को ले जाना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि भगवान की वीतरागता को समझें, जिनवाणी के सत्य को आत्मसात करें, आत्मा और शरीर के भेद को समझें तथा राग-द्वेष से ऊपर उठने का पुरुषार्थ करें।

उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन यह बोध कराता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप बाहरी वैभव, शरीर और संसार के पदार्थों में नहीं, बल्कि शुद्ध चेतन आत्मा में है। जीवन में सबसे पहले सम्यक् श्रद्धा को दृढ़ बनाना आवश्यक है। जब दृष्टि सही होगी, तभी ज्ञान सही दिशा में आगे बढ़ेगा और ज्ञान की सही दिशा ही जीवन के आचरण को शुद्ध करेगी।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि ज्ञान और चारित्र को अपनाने से पहले सम्यग्दर्शन को मजबूत बनाइए, क्योंकि सही दृष्टि ही सही दिशा देती है और सही दिशा ही जीव को संसार-सागर से निकालकर मोक्ष के तट तक पहुंचाती है।

धर्मसभा में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ अर्जित किया। अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री महावीर जी, श्रीमती इंद्रा जी, श्री राजीव जी, श्रीमती कुसुम जी, श्री अखिलेश जी, श्रीमती गरिमा जी, तनिष्क जी, रक्षिता जी, दिलिशा जी, भाविशा जी एवं समस्त बगड़ा परिवार, बिजोलिया वाले तथा श्री लोकेश जी, श्रीमती सारिका जी, चित्रांश जी, यश जी एवं समस्त पाटोदी परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री हरीशचंद जी, श्री अनुराग जी, श्रीमती शालू जी, श्री आशीष जी, श्रीमती अनुषा जी, श्रीमती साक्षी जी, श्री हिमांश जी एवं समस्त टोंग्या परिवार, महावीर नगर विस्तार योजना, कोटा — श्रीमती साक्षी टोंग्या जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में तथा श्री पारस कुमार जी, श्रीमती चंद्रकला जी, श्री राजकुमार जी एवं श्रीमती मोनिका जी कोटिया परिवार, करवर वाले, महावीर नगर विस्तार, कोटा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका, श्री प्रकाश हरसोरा, श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री विनोद जी एवं श्रीमती कामिनी गर्ग परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विनोद जी गर्ग परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। गुरुवाणी के अमृत संदेश में कहा गया कि “सम्यग्दर्शन धर्म का बीज है, सम्यग्ज्ञान उसका विकास है, सम्यक् चारित्र उसका आचरण है और मोक्ष उसका परम फल है।” धर्मसभा में सम्यग्दर्शन को जीवन की सही दिशा और मोक्षमार्ग की आधारभूमि के रूप में अपनाने का संदेश दिया गया।

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