पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी, कोटा में गुरुवार, 8 अक्टूबर को आयोजित धर्मसभा के दौरान प्रवचन देते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज और उपस्थित श्रद्धालुगण।

कोटा में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्रावक के मूल गुणों, पापों के त्याग और संयम की साधना पर प्रवचन देते हुए कहा कि वास्तविक त्याग केवल बाहरी वस्तुओं को छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि मोह, ममत्व और आसक्ति से मुक्त होना ही त्याग का वास्तविक स्वरूप है। जब तक मन में वस्तुओं के प्रति 'मेरा-तेरा' का भाव बना रहता है, तब तक पूर्ण त्याग संभव नहीं है।

कोटा स्थित पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी में गुरुवार, 8 अक्टूबर को निर्वापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 66 के माध्यम से श्रावक के मूल गुणों, पापों के त्याग और संयम की साधना पर प्रवचन दिए। उन्होंने बताया कि श्रावक के आठ मूल गुण माने गए हैं। इनमें पांच पापों—हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह—के साथ तीन मकार अर्थात् मधु, मांस और मद्य का त्याग शामिल है। इसके अतिरिक्त पांच उदुम्बर फलों बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर और पाकर आदि का त्याग भी अहिंसा की भावना को मजबूत करता है।

मुनि श्री ने कहा कि त्याग का अर्थ केवल बाहरी आकर्षणों और वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि भीतर से मोह और ममत्व को कम करना भी है। व्यक्ति को अपने मन से 'मेरा-तेरा' का भाव समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए। मान-सम्मान प्राप्त करने, ध्यान करने, दान देने अथवा त्याग करने के बाद भी यदि मन बार-बार उन्हीं कार्यों और उपलब्धियों का स्मरण करता रहता है, तो उसे पूर्ण त्याग नहीं कहा जा सकता। वास्तविक त्याग वही है, जिसमें वस्तु के साथ उसके प्रति आसक्ति भी समाप्त हो जाए। निस्पृह होना अर्थात् इच्छाओं से मुक्त होना त्याग की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण आधार है।

संसार और शरीर के प्रति वैराग्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि साधु की दृष्टि में संसार तृण के समान, वीर की दृष्टि में शरीर तृण के समान और अतिवीर की दृष्टि में स्त्री तृण के समान कही गई है। इसका आशय बाहरी वस्तुओं की निंदा करना नहीं, बल्कि साधक की बढ़ती वैराग्य भावना और आसक्ति से मुक्ति की अवस्था को समझना है।

मुनि श्री ने श्रावक के व्रतों की व्याख्या करते हुए बताया कि श्रावक के पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत होते हैं। तीन गुणव्रतों में दिग्व्रत, अनर्थदण्ड व्रत और भोगोपभोग परिमाण व्रत शामिल हैं। उन्होंने भोग और उपभोग के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिन वस्तुओं का एक बार उपयोग किया जाता है, वे भोग कहलाती हैं, जबकि बार-बार उपयोग में आने वाली वस्तुएं उपभोग की श्रेणी में आती हैं। इनकी सीमा निर्धारित करने से व्यक्ति धीरे-धीरे संतोष और संयम की ओर बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि संतोषी बनना पाप से बचने की नियमावली है। संयम एक दिन में विकसित नहीं होता, बल्कि निरंतर अभ्यास और संस्कारों के माध्यम से धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बनता है। श्रावक के लिए संयम का यही अभ्यास आगे चलकर मुनि दीक्षा और पूर्ण संयम की साधना का आधार बनता है।

श्रावक के संयम के दो प्रमुख रूपों का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने इन्द्रिय संयम और प्राणी संयम को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि कर्मों की निर्जरा का मुख्य लक्ष्य संयम होना चाहिए। अंश, क्षण और ऊनोदर जैसे साधन भी शरीर तथा विषयों के प्रति मूर्छा और आसक्ति को कम करने में सहायक होते हैं।

मुनि श्री ने मनुष्य की वर्तमान मानसिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मनुष्य स्वयं को शरीर का दास बना बैठा है, जबकि साधना का उद्देश्य शरीर को आत्मा का दास बनाना होना चाहिए। इसके लिए व्यक्ति को अपनी उपादान शक्ति जागृत करनी होगी। जीव पाप और पुण्य दोनों की बेड़ियों में बंधा हुआ है तथा बाहरी निमित्त मात्र उसकी परिणति में सहायक होते हैं। इसलिए साधक को बाहरी निमित्तों में उलझने के बजाय अपनी आत्मिक शक्ति और पुरुषार्थ को पहचानना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि त्याग का वास्तविक अर्थ केवल वस्तुओं की संख्या कम करना नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति और ममत्व को समाप्त करना है। 'मेरा' और 'तेरा' का भाव छूटने पर ही आत्मा की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। संयम, संतोष और निस्पृहता के अभ्यास से श्रावक अपने जीवन को क्रमशः आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में ले जा सकता है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज के प्रवचनों में त्याग के बाहरी स्वरूप के साथ आंतरिक शुद्धि, आत्मिक शक्ति और आसक्ति से मुक्ति के महत्व को रेखांकित किया गया।

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