तस्वीर में कोटा में जैन मुनि के सामने हाथ जोड़कर खड़े श्रद्धालु दिख रहे हैं।

कोटा, 15 सितम्बर। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरंड श्रावकाचार के श्लोक 48-49 पर प्रवचन करते हुए कहा कि दुःख का प्रमुख कारण शरीर है। शरीर के माध्यम से ही जीव पांचों पापों में प्रवृत्त होता है। जब तक जीवन में राग-द्वेष विद्यमान रहते हैं, तब तक कर्मों का बंध और सुख-दुःख का संसार चलता रहता है।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि राग-द्वेष आत्मकल्याण के बाधक कारण हैं, इसलिए इनका त्याग अनिवार्य है। जिस प्रकार मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति के लिए शक्कर बाधक होती है, उसी प्रकार आत्मा की शुद्धि के लिए राग-द्वेष बाधक हैं। स्वार्थ और अपेक्षा के कारण किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है और यही इच्छा आगे चलकर परिग्रह भाव को जन्म देती है।

उन्होंने कहा कि अनादिकाल से ‘मेरा-मेरा’ और ‘मेरी ममता’ का परिग्रहरूपी ग्रह जीव के पीछे लगा हुआ है। यही मोह और ममत्व दुःख का मूल कारण है। ‘यह मेरा है, यह तेरा है’—इस प्रकार भेद करने वाला व्यक्ति संकीर्ण बुद्धि वाला होता है, जबकि उदार बुद्धि वाला व्यक्ति समस्त जीवों के प्रति सद्भाव, सम्मान और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना रखता है।

मुनि श्री ने अहिंसा के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि मुनिराज प्रत्येक जीव के प्रति अहिंसा का भाव रखते हैं। आवश्यकता से अधिक प्रवृत्ति करने पर हिंसा होती है और हिंसा करने, कराने तथा उसकी अनुमोदना करने—तीनों में दोष लगता है। इसलिए आत्मकल्याण के लिए संयमित और मर्यादित प्रवृत्ति आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि हिंसा, चोरी, झूठ, कुशील और परिग्रह—ये पांच पाप हैं। इनका त्याग करने से जीव विरक्ति की ओर बढ़ता है। विषय और कषायों से दूर रहकर आत्मा में लीन होना ही वास्तविक उपवास और त्याग की दिशा है।

महाराज श्री ने कहा कि साधु शरीर की भूख को शांत करने के लिए आहार ग्रहण करते हैं, लेकिन शरीर के प्रति मोह नहीं रखते। साधना का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा को विषय-कषाय और मोह-ममत्व से दूर करना है।

मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि एकदेश व्रत का त्याग, आजीवन नियम अथवा कुछ दिनों के लिए लिया गया त्याग—इन सभी का उद्देश्य आत्मा को बाधक कारणों से दूर कर साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाना है। जब राग-द्वेष और पापों की निवृत्ति होती है, तब आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि बाधक कारणों को छोड़ना ही साधक को आत्मस्वरूप की ओर ले जाने वाला वास्तविक पुरुषार्थ है। जीवन में राग-द्वेष, मोह, ममत्व और परिग्रह जितना कम होगा, आत्मशुद्धि और विरक्ति की दिशा में उतनी ही प्रगति होगी।

चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रद्धालुओं ने इसमें पुण्यार्जन कर धर्मलाभ अर्जित किया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि जिन्वर्स ग्रुप परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक पुण्यार्जन किया गया।

अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन पदम, राजेंद्र, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमती कमलेश कोटिया, चक्रेश एवं निलेश कोटिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला, विवेक ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान रमेश जी, अशोक जी एवं महेंद्र जी धनोत्या, आवा वाले परिवार को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य दिनेश एवं सुनीता दुगेरिया को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर सुश्री प्रियांशी खटोड़ द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

आज के प्रवचन का सार बताते हुए कहा गया कि आत्मकल्याण के मार्ग में सबसे बड़े बाधक राग-द्वेष, मोह, ममत्व और परिग्रह हैं। इन बाधक कारणों का त्याग किए बिना आत्मा की शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना कठिन है। हिंसा, चोरी, झूठ, कुशील और परिग्रह जैसे पापों से दूर रहकर संयमित एवं मर्यादित जीवन जीना आवश्यक है।

‘मेरा-तेरा’ की भावना छोड़कर आत्मस्वरूप की ओर बढ़ें। हेय को छोड़ना और उपादेय को अपनाना ही साधक का वास्तविक पुरुषार्थ है। बाधक भाव जितने छूटेंगे, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का मार्ग उतना ही प्रशस्त होता जाएगा।

Tags: