तस्वीर में कोटा के नसियां जी मंदिर में मुनि योगसागर जी महाराज और विभिन्न श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठान के दौरान।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी विरचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के 38वें श्लोक की व्याख्या करते हुए कर्म, सम्यग्दर्शन, सामायिक और आत्मकल्याण के मार्ग पर गहन आध्यात्मिक संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि जीव अपने कर्मों के अधीन संसार में विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करता है। इसलिए मनुष्य को संसार में रहते हुए अपनी आत्मिक पहचान को कभी नहीं भूलना चाहिए।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया में रहना बुरा नहीं है, लेकिन दुनिया को अपने भीतर बसा लेना बंधन का कारण बन जाता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि व्यक्ति राग-द्वेष और आसक्ति से दूर रहकर आत्मा की साधना करता है तो वह मोक्षमार्ग की ओर निरंतर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि जैसे नाव की शोभा पानी में ही होती है, वैसे ही मनुष्य संसार में रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन करे, लेकिन उसका मन संसार की आसक्ति में डूबा न रहे। संसार में रहना है, लेकिन संसार को अपने भीतर नहीं बसाना है।

मुनिश्री ने कहा कि बाधक तत्वों के समाप्त होते ही साधक तत्वों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जिस प्रकार अंधकार के हटते ही प्रकाश प्रकट होता है, उसी प्रकार पाप और अशुभ भावों का क्षय होने पर पुण्य का प्रभाव दिखाई देने लगता है। जीवन में धर्म का वास्तविक चमत्कार तभी दिखाई देता है, जब व्यक्ति अपने भीतर के अशुभ परिणामों को कम करने का पुरुषार्थ करता है। पाप का अभाव ही पुण्य के प्रभाव को प्रकट करने का माध्यम बनता है।

कर्म के सिद्धांत को अटल बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने सुख-दुःख के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों और वर्तमान परिणामों को देखना चाहिए। हमारे वर्तमान भाव और परिणाम ही आगे होने वाले कर्मबंध तथा जीवन की दिशा का आधार बनते हैं। यदि जीवन में परिवर्तन चाहते हैं तो सबसे पहले अपने भावों में परिवर्तन करना होगा। बाहरी परिस्थितियों को बदलने से अधिक आवश्यक है कि व्यक्ति अपने भीतर के राग, द्वेष, क्रोध, मोह और आसक्ति को पहचाने।

मुनि श्री ने सामायिक का महत्व बताते हुए कहा कि सामायिक केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि समता और आत्मानुभूति का अभ्यास है। सामायिक के दौरान बाहरी प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कुछ समय के लिए जीव संसार के राग-द्वेष से हटकर अपने आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयास करे। उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन केवल पढ़ने या सुनने का विषय नहीं, बल्कि श्रद्धा और अनुभूति का विषय है। जब सही श्रद्धा जीवन के परिणामों में उतरती है, तभी आत्मकल्याण की वास्तविक यात्रा प्रारंभ होती है।

महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर उठने का पुरुषार्थ करना चाहिए। बाधक कारणों को हटाइए, साधक कारणों को अपनाइए और अपने भीतर सम्यक् श्रद्धा को जागृत कीजिए। उन्होंने कहा कि जीवन में निरंतर विचार करना चाहिए कि वर्तमान भाव किस दिशा में जा रहे हैं। यदि पाप और अशुभ परिणाम घटेंगे तो पुण्य का प्रभाव निखरेगा और सम्यग्दर्शन की श्रद्धा जब अनुभूति का रूप लेगी, तभी आत्मकल्याण का मार्ग सार्थक होगा।

चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन चन्द्रप्रकाश र्षा-कोटिया द्वारा अपने जन्मदिन के शुभ अवसर पर श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने इसकी जानकारी दी। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री त्रिलोक जी एवं श्रीमती रेखा जी लुहाड़िया द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा, श्रीमती सुशीला एवं विवेक ठोरा परिवार तथा महावीर एवं श्रीमती भारती मित्तल परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती सुशीला जी एवं विनोद जी गर्ग को प्राप्त हुआ। दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य अशोक, श्रीमती इंद्रा, अर्पित एवं श्रीमती नमिता बरमुंडा को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती स्वपनिल ने श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। प्रवचन का सार यही रहा कि कर्म का नियम अटल है, संसार में रहते हुए भी उसे अपने भीतर नहीं बसाना चाहिए, बाधक तत्वों को हटाकर साधक तत्वों को अपनाना चाहिए और पाप के घटने के साथ पुण्य को निखारते हुए सम्यग्दर्शन को अनुभूति में उतारना चाहिए। इसी से आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की सार्थक शुरुआत होती है।

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