काल द्रव्य ही संसार के परिवर्तन का कारण: मुनि विवर्धनसागर जी महाराज
कोटा के कुन्हाड़ी में मुनि विवर्धनसागर जी महाराज ने काल द्रव्य और संसार के परिवर्तन के रहस्य पर दिए विचार। जानिए भोगभूमि, कर्मभूमि और समय चक्र से जुड़े जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांत।
तस्वीर में मुनि विवर्धनसागर जी महाराज धर्मसभा में श्रद्धालुओं को प्रवचन देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
कोटा के कुन्हाड़ी स्थित रिद्धि-सिद्धि नगर के अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में 'विराग वर्धन वर्षायोग-2026' के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान धर्मसभा का आयोजन हुआ। धर्मसभा से पूर्व मुनिश्री का रिद्धि-सिद्धि नगर में मंगल प्रवेश हुआ, जहां श्रद्धालुओं ने मंगल कलश एवं धार्मिक विधि-विधान के साथ मुनिसंघ का आत्मीय स्वागत किया।
प्रवचन के दौरान मुनि विवर्धनसागर जी महाराज ने काल द्रव्य की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि जो समय का ज्ञान कराता है, वही काल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि घड़ी, पहर, घंटा, दिन, पक्ष, माह और वर्ष आदि व्यवहार काल के विभिन्न रूप हैं। समय के तीनों रूपों को समझाते हुए उन्होंने बताया कि भूतकाल बीत चुका समय है, भविष्य आने वाला समय है और जो वर्तमान में चल रहा है, वह वर्तमान काल है। काल को गहराई से समझने पर ही जीवन और संसार में होने वाले निरंतर परिवर्तन का बोध होता है।
जैन दर्शन के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रारंभिक तीन काल भोगभूमि के होते हैं। भोगभूमि में मनुष्य की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति कल्पवृक्षों के माध्यम से होती है, जिसके कारण वहां धर्म साधना का अवसर प्राप्त नहीं होता। चौथे काल से कर्मभूमि का प्रारंभ माना गया है और इसी कर्मभूमि में तीर्थंकरों सहित शलाका पुरुषों का जन्म तथा मोक्ष होता है।
काल द्रव्य की तात्विक स्थिति को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि जैन दर्शन के अनुसार कालाणु लोकाकाश के एक-एक प्रदेश में स्थित माने गए हैं। धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य अखंड हैं, जबकि काल द्रव्य पृथक-पृथक माना गया है। संसार में घटने वाली परिवर्तन की संपूर्ण प्रक्रिया को समझने के लिए काल द्रव्य का बोध अत्यंत आवश्यक है।
आयोजन के दौरान महाराष्ट्र से आए श्रद्धालु अविनाश जैन एवं अनुराधा जैन ने सपरिवार दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरण एवं शास्त्र भेंट करके पुण्यार्जन प्राप्त किया। मुनिश्री ने निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज से हुए मंगल मिलन को अत्यंत सुखद बताते हुए उपस्थित धर्मसभा को सामूहिक क्षमावाणी के भाव को आत्मसात करने का पावन संदेश दिया।
इस धार्मिक आयोजन में मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने उपस्थित श्रद्धालुओं से धर्मसभा का अधिक से अधिक लाभ लेने का आह्वान किया। इस अवसर पर निर्मल अजमेरा, महावीर सदारी, रमेश साकुनिया, रामबाबू जैन, टीकम पाटनी, पुष्प लुहाड़िया, प्रेमचंद दुगेरिया सहित महाराष्ट्र से आए गुरु भक्त एवं स्थानीय जैन समाजजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।