मद से नहीं, विनय से बढ़ता है धर्म—मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने बताया सम्यग्दर्शन का मर्म
कोटा के नसियाजी दादाबाड़ी में मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने सम्यग्दर्शन की व्याख्या करते हुए उपलब्धियों के अहंकार से बचने और धर्मात्माओं के सम्मान का संदेश दिया। जानिए पुण्यार्जकों और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा विवरण।
तस्वीर में कोटा के नसियाजी दादाबाड़ी में धर्मसभा के दौरान मुनिश्री योगसागर जी महाराज और अन्य श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
कोटा, 23 अगस्त। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के सम्यग्दर्शन अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन में उपलब्धियां प्राप्त होना बुरा नहीं है, लेकिन उपलब्धियों का अहंकार अर्थात् मद आत्मिक पतन का कारण बन जाता है। उन्होंने कहा कि मद मनुष्य को धर्म से नहीं, बल्कि धर्मात्माओं से दूर करता है।
मुख्य संयोजक हुकम काका ने बताया कि मुनिश्री ने कहा कि जब मनुष्य अपने ज्ञान, धन, कुल, रूप, तप, पद या प्रतिष्ठा का अभिमान करने लगता है, तब उसके भीतर विनय का क्षय होने लगता है। यही अहंकार धीरे-धीरे उसे धर्म के वास्तविक स्वरूप से विमुख कर देता है।
मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि यदि मद के कारण व्यक्ति किसी धर्मात्मा का तिरस्कार करता है तो वह वास्तव में अपने ही धर्म का तिरस्कार करता है। धर्म केवल ग्रंथों और मंदिरों में नहीं, बल्कि साधु-संतों, श्रावकों और धर्मनिष्ठ जीवों के आचरण में जीवंत रहता है। इसलिए धर्मात्मा का सम्मान करना धर्म के प्रति सम्मान प्रकट करना है।
उन्होंने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति दूसरे धर्मात्मा के गुणों को देखकर ईर्ष्या नहीं करता, बल्कि प्रसन्न होता है। वह प्रत्येक साधर्मी के प्रति विनय, वात्सल्य और सम्मान का भाव रखता है।
मुनिश्री ने कहा कि थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्त होते ही यदि ज्ञान का अहंकार उत्पन्न हो जाए, धन मिलने पर धन का मद, ऊंचे कुल में जन्म लेने पर कुल का मद, सुंदर शरीर मिलने पर रूप का मद और तप करने पर तप का अहंकार हो जाए, तो यही उपलब्धियां आत्मकल्याण के बजाय आत्मपतन का कारण बन जाती हैं।
उन्होंने कहा कि ज्ञान की सार्थकता विनय में है, धन की सार्थकता सेवा में है, शक्ति की सार्थकता परोपकार में है और तप की सार्थकता अहंकार के क्षय में है। उपलब्धियां तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग धर्म और समाज के हित में हो।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को सावधान करते हुए कहा कि अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप से मनुष्य के भीतर प्रवेश करता है। कभी ज्ञान का अहंकार, कभी धन का, कभी पद-प्रतिष्ठा का और कभी-कभी धार्मिकता का अहंकार भी मनुष्य को घेर लेता है। सच्चा धर्म मनुष्य को ऊंचा उठाकर दूसरों को नीचा देखने की दृष्टि नहीं देता, बल्कि जितना व्यक्ति भीतर से ऊंचा उठता है, उतना ही अधिक विनम्र और सरल बनता जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त हो तो उसे अपनी श्रेष्ठता का कारण न मानें, बल्कि पुण्य का परिणाम मानकर धर्म, समाज और परोपकार में लगाएं। यही उपलब्धियों की वास्तविक सार्थकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि दूसरों को देखने से पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। यदि हमारे भीतर मद बढ़ रहा है तो धर्म का प्रभाव घट रहा है और यदि विनय बढ़ रही है तो समझना चाहिए कि धर्म हमारे जीवन में उतर रहा है।
मुनिश्री का अमृत संदेश रहा—“मद बढ़े तो धर्म घटे, विनय बढ़े तो धर्म बढ़े। धर्मात्मा का मान करें, तो अपना धर्म खिले। ज्ञान मिले तो विनय रहे, तप में न अभिमान हो। मद छोड़कर धर्म जिएँ—यही सम्यग्दर्शन की पहचान हो।”
आज के प्रमुख पुण्यार्जकों के संबंध में अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्रीमती विमला जी-भानु जी, एकता जी-कुणाल जी, भावना जी-रक्षित जी, समस्त बोरखंडिया परिवार, बसंत विहार तथा विकास जी, नीलम जी, मानवी, दिवी एवं समस्त ठग परिवार, मांडलगढ़ वालों द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि जैनेश्वरी मुनि दीक्षा के सानंद संपन्न होने के उपलक्ष्य में आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन शांतिलाल जी, सुनील जी, अनिल जी, अलीगढ़ वाले, श्रीमती सुशीला जी, श्री विवेक जी ठोरा एवं जैन सोशल ग्रुप द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने, उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन पारस जी, शशि जी, एकता जी, अनमोल जी, अतिशय जी एवं समस्त जैन सेठिया परिवार, बोराव वाले तथा राकेश जी, शालिनी जी एवं लव्यंश जी द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया।
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री महावीर जी एवं श्री राजीव जी बगड़ा परिवार को प्राप्त हुआ। दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री विनोद जी एवं श्रीमती कामिनी गर्ग परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती शशि सेठिया द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
गुरुवाणी का अमृत संदेश रहा—“उपलब्धियां जीवन की शोभा नहीं, उनका विनम्र सदुपयोग ही जीवन की सार्थकता है।” मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में स्पष्ट किया कि धर्म की वास्तविक पहचान उपलब्धियों के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि विनय, धर्मात्माओं के सम्मान और अहंकार के क्षय में है।