तस्वीर में श्रद्धालु कोटा के मंदिर में जैन मुनि के पाद प्रक्षालन की धार्मिक विधि करते दिख रहे हैं।   

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान आयोजित धर्मसभा में जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों का सरलता से विवेचन किया गया। मुनिश्री ने द्रव्यसंग्रह की कारिकाओं के माध्यम से पुद्गल, अणु, स्कंध और धर्म द्रव्य के स्वरूप एवं उनके कार्यों को समझाया।

मुनिश्री ने द्रव्यसंग्रह की 16वीं कारिका का उल्लेख करते हुए बताया कि पुद्गल की अनेक पर्यायें होती हैं। जीव की शुद्ध पर्याय सिद्ध अवस्था है, जबकि पुद्गल में स्पर्श, रस, वर्ण और गंध आदि गुण पाए जाते हैं। स्निग्ध और रूक्ष गुणों के कारण परमाणुओं में परस्पर बंध होता है। समान शक्ति वाले परमाणुओं में बंध नहीं होता, जबकि भिन्न शक्ति वाले परमाणुओं में बंध की प्रक्रिया होती है।

मुनिश्री ने पुद्गल की अन्य पर्यायों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकाश के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होने पर छाया बनती है। सूर्य का प्रकाश आतप तथा चंद्रमा और जुगनू का प्रकाश उद्योत कहलाता है। उन्होंने मूर्त और अमूर्त द्रव्यों के अंतर को भी स्पष्ट किया। स्पर्श, रस, गंध और वर्ण वाले द्रव्य मूर्त होते हैं, जबकि जीव, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल अमूर्त द्रव्यों की श्रेणी में आते हैं।

धर्म द्रव्य के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मुनिश्री ने बताया कि गति में धर्म द्रव्य सहायक होता है। द्रव्यसंग्रह की कारिकाओं के माध्यम से जैन दर्शन के इन सिद्धांतों को धर्मसभा में सरल रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे पुद्गल की पर्यायों और विभिन्न द्रव्यों के स्वरूप की व्याख्या सामने आई।

मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा और मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा के दौरान चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं पाद प्रक्षालन का सौभाग्य सुनील कुमार बड़जात्या परिवार, कमला उद्यान वालों ने प्राप्त किया। इस अवसर पर जम्बू अजमेरा, महावीर बड़ला, पारस लुहाड़िया, राजू पाटनी, जम्बू गोधा, गजेंद्र जैन, सुरेश सिंधी, नितेश खटोड़ सहित समाज के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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