काबुल में प्रेस वार्ता के दौरान तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों पर बयान देते हुए।   

अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात ने कहा है कि दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी जगह दोबारा मजबूत करने के प्रयासों के बावजूद देश को वैश्विक मामलों में भागीदारी के लिए अब भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इन पाबंदियों के कारण अफगानिस्तान की कुछ अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भागीदारी सीमित है, जबकि कई मामलों में उसे अपने अधिकारों से भी वंचित होना पड़ा है।

इस्लामिक अमीरात के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने TOLOnews से बातचीत में कहा कि अफगानिस्तान अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह स्थान हासिल नहीं कर पाया है, जिसकी उसे अपेक्षा है। उन्होंने कहा कि कई देशों के साथ काबुल के मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों में देश की भागीदारी पर अब भी कुछ प्रतिबंध लागू हैं।

मुजाहिद ने कहा, “अफगानिस्तान ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय समुदाय में शामिल होने का प्रयास किया है, लेकिन हम अभी तक वह हासिल नहीं कर पाए हैं जो वास्तव में चाहते हैं। इसका कारण यह है कि अब भी कुछ प्रतिबंध मौजूद हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि इस्लामिक अमीरात के प्रयासों के बावजूद कई मामलों में अफगान नागरिकों को उनके अधिकार नहीं मिल पाए हैं।

उनकी यह टिप्पणी अगस्त 2021 में इस्लामिक अमीरात के सत्ता में लौटने के बाद से अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को लेकर जारी प्रयासों और चुनौतियों को सामने लाती है। पांच वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद अफगानिस्तान ने कई देशों के साथ राजनयिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए हैं, लेकिन उसकी सरकार को औपचारिक अंतरराष्ट्रीय मान्यता अभी भी सीमित स्तर पर मिली है।

जुलाई 2025 में रूस इस्लामिक अमीरात की सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला पहला देश बना था। इसके बावजूद व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता की कमी अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भागीदारी और उच्चस्तरीय राजनयिक संपर्कों को प्रभावित कर रही है। शासन व्यवस्था और मानवाधिकारों को लेकर मतभेद भी पश्चिमी देशों के साथ संबंध सामान्य बनाने की राह में प्रमुख बाधाएं बने हुए हैं।

इस्लामिक अमीरात लगातार आपसी सम्मान के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की मांग करता रहा है। उसका तर्क है कि अफगानिस्तान को अलग-थलग रखने से वहां के नागरिकों को नुकसान पहुंचता है और क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक विकास तथा स्थिरता के अवसर प्रभावित होते हैं।

काबुल का कहना है कि अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मामलों में भाग लेने और राजनयिक संबंध आगे बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए। राजनीतिक विवादों का खामियाजा देश की पूरी आबादी को नहीं भुगतना चाहिए।

अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति का सवाल इस्लामिक अमीरात के सामने अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार जहां राजनयिक संबंधों के विस्तार, निवेश आकर्षित करने और आर्थिक परिस्थितियों में सुधार की कोशिश कर रही है, वहीं देश की मानवीय जरूरतों और विकास संबंधी चुनौतियों के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों तक उसकी पहुंच और औपचारिक मान्यता का मुद्दा लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।