अंतरराष्ट्रीय धर्मशास्त्रीय आयोग का पुनर्गठन व वैटिकन में चर्च परंपरा का अध्ययन।

पोप लियो XIV ने कैथोलिक चर्च की परंपरा का अर्थ स्पष्ट करने और आस्था के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण को समझने के लिए धर्मशास्त्रियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय धर्मशास्त्रीय आयोग (International Theological Commission) का बड़े स्तर पर पुनर्गठन करते हुए 24 नए सदस्यों की नियुक्ति की। ये सदस्य अगले पांच वर्षों तक आयोग के कार्यों में भाग लेंगे।

नियुक्त किए गए नए सदस्यों में लैटिन अमेरिका के चार धर्मशास्त्री और स्पेन का एक धर्मशास्त्री शामिल हैं। नए समूह में 16 पादरी, एक धर्मसंघ की महिला सदस्य और सात सामान्य विश्वासी हैं। आयोग के अन्य छह सदस्य अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करेंगे। नए नियुक्त सदस्यों में अर्जेंटीना के पादरी फाब्रिसियो लियोनेल फोर्काट और जॉर्ज अलेजांद्रो स्कैम्पिनी भी शामिल हैं। दोनों अर्जेंटीना के पोंटिफिकल कैथोलिक विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र संकाय में प्रोफेसर हैं।

आस्था के सिद्धांत संबंधी विभाग (Dicastery for the Doctrine of the Faith) के सूत्रों ने EWTN News Español को बताया कि आयोग को दो विषयगत उपआयोगों में विभाजित किया जाएगा। पहला उपआयोग चर्च की परंपरा का अध्ययन करेगा। कैथोलिक धर्मशास्त्र में यह विषय केंद्रीय महत्व रखता है और इसके माध्यम से यह समझने में मदद मिलती है कि सदियों से आस्था किस प्रकार आगे बढ़ाई गई है।

सूत्रों के अनुसार, इस उपआयोग का उद्देश्य यह स्पष्ट करना होगा कि बड़े अक्षर वाले ‘T’ के साथ लिखे जाने वाले ‘Tradition’ का वास्तविक अर्थ क्या है, यह कहां विद्यमान है और यह कैसे निर्धारित किया जाता है कि कोई विचार या परंपरा चर्च की मूल परंपरा का हिस्सा है या नहीं। इस अध्ययन में बाइबिल संबंधी, प्रारंभिक ईसाई धर्मगुरुओं के लेखन से जुड़े, ऐतिहासिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक योगदानों का भी सहारा लिया जाएगा। इसके साथ ही इस विषय पर चर्च के आधिकारिक शिक्षण प्राधिकार के चिंतन के विकास का अध्ययन किया जाएगा।

सूत्रों ने कहा कि आयोग यह समझने का प्रयास करेगा कि पोप पॉल VI से लेकर ‘Magnifica Humanitas’ तक विभिन्न पोप ने इस विषय पर क्या स्पष्टीकरण दिए हैं और उन्हें किस प्रकार समग्र रूप से समझा जा सकता है।

आस्था और संस्कृति पर भी होगा अध्ययन

दूसरा उपआयोग उन सांस्कृतिक रूपों का अध्ययन करेगा, जिनके माध्यम से आस्था का प्रसार होता है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि चर्च की जीवंत परंपरा अलग-अलग संस्कृतियों में किस प्रकार अभिव्यक्त होती है और आगे बढ़ती है।

आस्था के सिद्धांत संबंधी विभाग के सूत्रों के अनुसार, इस उपआयोग का अध्ययन ईश्वर की प्रजा के विभिन्न सांस्कृतिक रूपों में प्रकट होने वाली जीवंत परंपरा पर केंद्रित होगा। इसमें स्थानीय संस्कृति के अनुरूप आस्था की अभिव्यक्ति, लोकप्रिय धार्मिक भक्ति और उन विभिन्न भाषाई रूपों का गहन विश्लेषण किया जाएगा, जिनके माध्यम से अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भों में ईसाई आस्था को व्यक्त और संप्रेषित किया जाता है।

सूत्रों ने बताया कि इन विषयों का चयन आयोग के अध्यक्ष और आस्था के सिद्धांत संबंधी विभाग के प्रीफेक्ट कार्डिनल विक्टर मैनुअल फर्नांडीज तथा पोप के बीच संवाद के आधार पर किया गया है।

1969 में हुई थी आयोग की स्थापना

अंतरराष्ट्रीय धर्मशास्त्रीय आयोग की स्थापना सेंट पॉल VI ने 1969 में की थी। यह आयोग आस्था के सिद्धांत संबंधी विभाग से संबद्ध है और इसका प्रमुख कार्य पवित्र धर्मपीठ को विशेष महत्व वाले सैद्धांतिक प्रश्नों के अध्ययन में सहायता देना है।

दुनिया के विभिन्न हिस्सों से चुने जाने वाले आयोग के सदस्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त धर्मशास्त्री होते हैं। उनकी नियुक्ति पोप द्वारा विभाग के प्रीफेक्ट की सिफारिश पर की जाती है।

चर्च की परंपरा का क्या है अर्थ

कैथोलिक चर्च की धर्मशिक्षा (Catechism of the Catholic Church) के अनुच्छेद 78 के अनुसार, परंपरा पवित्र आत्मा में सुसमाचार के जीवंत हस्तांतरण की प्रक्रिया है। यह पवित्र धर्मग्रंथ से अलग है, लेकिन दोनों का आपस में गहरा संबंध है।

‘Dei Verbum’ के अनुच्छेद 8 के अनुसार, चर्च अपनी शिक्षा, जीवन और उपासना के माध्यम से हर पीढ़ी तक अपने अस्तित्व और विश्वास को पहुंचाता है तथा उसे निरंतर बनाए रखता है।

यह परंपरा उस ईश्वर के वचन को ग्रहण करती है, जिसे मसीह और पवित्र आत्मा ने प्रेरितों को सौंपा था। इसके बाद यह वचन संपूर्ण रूप से उनके उत्तराधिकारियों तक पहुंचाया जाता है, ताकि वे सत्य की आत्मा से प्रकाशित होकर उसका निष्ठापूर्वक संरक्षण करें, उसकी व्याख्या करें और अपने उपदेशों के माध्यम से उसका प्रसार करें। कैथोलिक चर्च की धर्मशिक्षा के अनुच्छेद 81 में भी यही बात स्पष्ट की गई है।

विशेष रूप से यह प्रेरितिक परंपरा से संबंधित है, जिसके माध्यम से प्रेरितों ने यीशु की शिक्षाओं और उनके उदाहरण से प्राप्त ज्ञान तथा पवित्र आत्मा के माध्यम से सीखी गई बातों को आगे पहुंचाया। यह चर्च की विशिष्ट स्थानीय और ऐतिहासिक परंपराओं से अलग है, जो स्थान और ऐतिहासिक काल के अनुसार बदल सकती हैं। कैथोलिक चर्च की धर्मशिक्षा का अनुच्छेद 83 इस अंतर को स्पष्ट करता है।

पोप लियो XIV द्वारा आयोग के पुनर्गठन और 24 नए सदस्यों की नियुक्ति के साथ चर्च की मूल परंपरा तथा विभिन्न संस्कृतियों में आस्था के संचार से जुड़े प्रश्नों के व्यवस्थित अध्ययन का रास्ता खुला है। आयोग का आगामी पांच वर्षीय कार्यकाल इन दोनों विषयों पर धर्मशास्त्रीय विचार-विमर्श को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहेगा।