अभिनेता इकबाल खान सोनी सब के शो यादें में डॉ. देव की भूमिका निभा रहे हैं।

सोनी सब के शो ‘यादें’ के आगामी ट्रैक में डॉ. देव की एक गर्भवती महिला की जान बचाने की कोशिश सामाजिक मान्यताओं से टकराती नजर आएगी। किल्लारी गाँव में मिश्री को चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ने पर डॉक्टर के सामने ऐसी चुनौती खड़ी हो जाती है, जिसमें एक तरफ मरीज की जान बचाने का कर्तव्य है और दूसरी तरफ गाँव वालों की लैंगिक भेदभाव पर आधारित रूढ़िवादी सोच। इस घटनाक्रम के जरिए शो में मानवता और सामाजिक प्रतिबंधों के बीच टकराव को दिखाया जाएगा।

सोनी सब का शो ‘यादें’ किल्लारी गाँव में डॉ. देव की भूमिका निभा रहे इकबाल खान की कहानी के माध्यम से महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को सामने ला रहा है। डॉक्टर के रूप में डॉ. देव का मानना है कि जरूरतमंद लोगों की मदद करना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। हालांकि, उनके पेशे के प्रति समर्पण की परीक्षा तब होती है, जब गाँव की गर्भवती महिला मिश्री को चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़ती है।

मिश्री का इलाज करने के लिए पूरी तरह योग्य होने के बावजूद डॉ. देव को गाँव वालों के विरोध का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण उन्हें सिर्फ इसलिए मिश्री का उपचार करने की अनुमति नहीं देते, क्योंकि वह पुरुष हैं और मिश्री महिला है। उनकी कठोर मान्यताओं के कारण डॉ. देव के लिए यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि किसी की जान बचाना डॉक्टर का कर्तव्य है और यह जिम्मेदारी किसी भी लैंगिक पाबंदी से ऊपर होनी चाहिए।

मिश्री को तकलीफ में नहीं देख पाने वाले डॉ. देव गाँव वालों को मनाने के लिए एक नाटक रचते हैं, ताकि वे उन्हें उसका इलाज करने की अनुमति दे दें। हालांकि, उनकी योजना उस समय अप्रत्याशित मोड़ ले लेती है, जब वह गाँव वालों को सच्चाई बताने का फैसला करते हैं। डॉ. देव स्वीकार करते हैं कि उन्होंने यह सब केवल मिश्री की मदद करने के लिए किया था।

उनकी इस हरकत से नाराज गाँव वाले उन पर पत्थर बरसाकर उन्हें दंडित करते हैं। मिश्री की मदद करने के लिए सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने की उन्हें कीमत चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद डॉ. देव अपने फैसले पर अडिग रहते हैं। उनका मानना है कि मरीज की जान हमेशा सबसे पहले आनी चाहिए, चाहे उसका लिंग कुछ भी हो।

अब शो के आगामी ट्रैक में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या डॉ. देव ग्रामीणों की सोच बदलने में सफल हो पाएँगे और उन्हें समझा पाएँगे कि किसी की जान बचाना लिंग आधारित पाबंदियों से कहीं अधिक जरूरी है।

आगामी घटनाक्रम के बारे में बात करते हुए इकबाल खान ने कहा, “मेरा मानना है कि हर विश्वास और परंपरा को समय के साथ विकसित होना चाहिए। यदि कोई चीज हमें किसी दूसरे इंसान की मदद करने से रोकती है या समाज के रूप में हमें पीछे ले जाती है, तो हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या उसका उद्देश्य आज भी प्रासंगिक है। डॉ. देव की इस परिस्थिति के माध्यम से हम यह दिखाना चाहते हैं कि मानवता के रास्ते में कोई भी सामाजिक मान्यता नहीं आनी चाहिए। शिक्षा केवल किताबों और डिग्रियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें यह समझ भी शामिल होनी चाहिए कि जरूरत के समय किसी के साथ खड़ा होना सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है। एक डॉक्टर के रूप में डॉ. देव की प्राथमिकता मिश्री की मदद करना है और मेरा मानना है कि यह ऐसा मूल्य है, जिसे हम सभी को अपनाना चाहिए, चाहे हमारा लिंग कुछ भी हो या समाज हमसे कैसी भी अपेक्षाएँ रखता हो।”

शो ‘यादें’ में डॉ. देव और मिश्री की कहानी के जरिए यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सामाजिक मान्यताएँ किसी जरूरतमंद को इलाज मिलने से रोक सकती हैं। देखिए ‘यादें’, हर सोमवार से शनिवार रात 8 बजे, सिर्फ सोनी सब पर।