महात्मा गांधी की नैतिक ताकत से कैसे बदल जाता था लोगों का नजरिया? अनुभव सिन्हा ने खोले कई पहलू
अनुभव सिन्हा और सुधीर मिश्रा की नई फिल्म स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर पर केंद्रित है जब गांधीजी ने 21 दिनों का आत्ममंथन किया था।
फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा, जिन्होंने हाल ही में महात्मा गांधी के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक पहलुओं पर अपनी बात साझा की है।
महात्मा गांधी की नैतिक ताकत ऐसी थी कि उनके एक फैसले से लोग अपने आपसी झगड़े तक छोड़ देते थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद होने के बावजूद देशहित को प्राथमिकता देने की भावना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान आज भी चर्चा का विषय है। फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा ने महात्मा गांधी के प्रभाव, उनकी नैतिक शक्ति और उस दौर के नेताओं के आपसी संबंधों पर अपनी सोच साझा की है। उनकी आने वाली फिल्म में गांधीजी के जीवन का एक अहम, लेकिन कम चर्चित अध्याय दिखाया जाएगा, जिसमें मनोज बाजपेयी महात्मा गांधी की भूमिका निभाते नजर आएंगे।
जाने-माने फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा और सुधीर मिश्रा ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए हाथ मिलाया है। इस सिनेमाई परियोजना के जरिए भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास से जुड़ी एक कम चर्चित कहानी पर्दे पर प्रस्तुत की जाएगी। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मनोज बाजपेयी फिल्म में मुख्य भूमिका निभाते हुए महात्मा गांधी के किरदार में दिखाई देंगे, जबकि सौरभ शुक्ला भी अहम भूमिका में नजर आएंगे। फिल्म की कहानी आजादी के दौर के उन 21 दिनों पर केंद्रित है, जब गांधीजी दिल्ली में सत्ता के केंद्र से दूर चले गए थे। उनका यह कदम चुपचाप आत्ममंथन के लिए उठाया गया था।
इस फिल्म का निर्माण अनुभव सिन्हा ने नरेंद्र हीरावत के साथ बनारस मीडिया वर्क्स के बैनर तले किया है, जबकि NH स्टूडियोज इसे प्रस्तुत कर रहा है। यह परियोजना दो अनुभवी कहानीकारों के बीच एक महत्वपूर्ण सिनेमाई सहयोग के रूप में सामने आ रही है।
ऐसा सिनेमा बनाने के लिए पहचाने जाने वाले अनुभव सिन्हा, जो सामाजिक मुद्दों पर बातचीत को बढ़ावा देता है, मानते हैं कि भारत के प्रमुख नेताओं के जीवन से जुड़ी कहानियों में आज के समय के लिए भी महत्वपूर्ण सीख मौजूद हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने अपने बेटे के साथ महात्मा गांधी के प्रभाव और उनकी नैतिक ताकत को लेकर हुई बातचीत का एक अनुभव साझा किया।
अनुभव सिन्हा ने बताया, "मैं अपने बेटे से बोल रहा था कि ‘गांधी वह आदमी था जो कहता था कि तुम लोग झगड़ा बंद नहीं करोगे तो मैं खाना नहीं खाऊंगा।’ तो मेरा बेटा हंसने लग गया। बोला, ‘तो?’ तो मैंने कहा, ‘लोग झगड़ा बंद कर देते थे।’ एक बार नहीं हुआ, कई बार हुआ। यह उस आदमी की पावर थी।"
सिन्हा ने इस बात पर भी जोर दिया कि उस दौर के नेता अपने व्यक्तिगत और वैचारिक मतभेदों को पीछे छोड़कर देश को प्राथमिकता देते थे। महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच का संबंध भी इसी भावना को दर्शाता है। दोनों के विचारों में अंतर होने के बावजूद देश के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में एक-दूसरे की क्षमताओं और योगदान को महत्व दिया गया।
इस संबंध में अनुभव सिन्हा ने कहा, "आंबेडकर के, गांधी के विचार सबको मालूम हैं। पर जब संविधान सभा बनती है, तो वो नेहरू से जाकर कहते हैं कि संविधान इनसे लिखवाओ, क्योंकि ये देश को बेहतर समझते हैं, देश के वंचितों को बेहतर समझते हैं। और वो आदमी जो उन्हें क्रिटिसाइज करता था, वो ऐसा करने को एग्री कर देता है। वो कांग्रेस पार्टी जॉइन करता है।"
अपनी आगामी फिल्म के पीछे की सोच पर बात करते हुए सिन्हा ने उस दौर के नेताओं के बीच आपसी सम्मान और निर्णय लेने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गांधी, आंबेडकर और सरदार पटेल जैसे नेताओं की खासियत यह थी कि वे व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद बड़े उद्देश्यों को प्राथमिकता देते थे।
सिन्हा ने कहा, "ये बड़े यूनिक लोग थे। आंबेडकर हों, गांधी हों, पटेल हों। ये बात तो सच है ना कि पटेल को ज्यादा वोट मिले थे और गांधी ने कहा कि नहीं, नेहरू! तो वो पीछे हट जाते हैं, और आपको कहीं भी गांधी, पटेल और नेहरू के बीच कोई दुश्मनी या तंज कसने वाली टिप्पणी देखने को नहीं मिलती। नेहरू, गांधी, यहां तक कि वी. पी. मेनन। इन लोगों पर तो बहुत ज्यादा काम होने की जरूरत है। भगत सिंह, बोस।"
फिल्म को लेकर पहले से ही फिल्म उद्योग में चर्चा है। अब दिग्गज अभिनेत्री वहीदा रहमान के इस परियोजना से जुड़ने के बाद इसे लेकर दिलचस्पी और बढ़ गई है। वहीदा रहमान आठ साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं। मनोज बाजपेयी, सौरभ शुक्ला और वहीदा रहमान जैसे कलाकारों से सजी यह ड्रामा फिल्म इतिहास के मानवीय पहलुओं को सामने लाने की कोशिश करेगी।
यह फिल्म भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास के एक ऐसे दौर पर केंद्रित है, जिसमें गांधीजी के व्यक्तित्व, उनके फैसलों और उस समय के नेताओं के बीच आपसी सम्मान को कहानी के जरिए प्रस्तुत किया जाएगा। भारतीय सिनेमा के दो रचनात्मक दिमागों के एक साथ आने से इस परियोजना को लेकर पहले से ही उत्सुकता बनी हुई है। फिल्म की कहानी ऐतिहासिक घटनाओं के साथ उनके व्यक्तिगत और मानवीय पहलुओं को भी सामने लाने पर केंद्रित है।
फिल्म का निर्देशन सुधीर मिश्रा ने किया है। इसमें मनोज बाजपेयी मुख्य भूमिका में महात्मा गांधी के किरदार में नजर आएंगे, जबकि सौरभ शुक्ला भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म का निर्माण अनुभव सिन्हा और नरेंद्र हीरावत ने बनारस मीडिया वर्क्स के बैनर तले किया है और इसे NH स्टूडियोज प्रस्तुत कर रहा है।