डीग में श्रीमद्भागवत कथा: पंडित मुरारी लाल ने किया वामन अवतार का वर्णन
खण्डेलवाल धर्मशाला में आयोजित कथा में व्यास पीठ से संत संग और सत्संग के महत्व पर प्रकाश डाला गया, बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
तस्वीर में डीग में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यास पीठ पर विराजमान पंडित मुरारी लाल पाराशर श्रद्धालुओं के साथ दिख रहे हैं।
डीग, 18 सितंबर। शहर की खण्डेलवाल धर्मशाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तृतीय दिवस व्यास पीठ पर विराजमान लक्ष्मण मंदिर के महंत एवं कथा प्रवक्ता पूज्य पंडित मुरारी लाल पाराशर ने भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामन अवतार और मोहिनी अवतार की कथा का वर्णन किया।
पूज्य पाराशर ने बताया कि भगवान विष्णु ने वामन रूप में यह अवतार उस समय लिया था, जब असुरराज बलि ने देवताओं से स्वर्ग छीन लिया था। वामन एक बौने ब्राह्मण के वेश में राजा बलि के पास पहुंचे और उनसे रहने के लिए तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने दान देने का वचन दिया।
इसके बाद वामन देव ने अपना विराट रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। वामन देव ने बलि के सिर पर पैर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया और देवताओं को स्वर्ग वापस दिला दिया।
पाराशर ने कहा कि भगवान भक्ति से बंध गए। भक्ति भगवान को बांधती है। भक्ति के कारण भगवान को भक्तों के पास आना पड़ता है, जबकि ज्ञान में ज्ञानी को भगवान के पास जाना पड़ता है। उन्होंने कहा, “भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी, बिन सत्संग ना पावही प्राणी।” भक्ति स्वतंत्र है और सारे गुणों का भंडार है, परंतु भक्ति सत्संग के द्वारा, संतों के संग के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।
उन्होंने कहा कि इसलिए व्यक्ति को जीवन में सत्संग अवश्य करना चाहिए। सत्संग से ही भक्ति का कल्याण होता है।
इस अवसर पर श्री मति कांति देवी, संजय खण्डेलवाल उर्फ बंटी, महेश खण्डेलवाल, आदित्य खण्डेलवाल, निखिल खण्डेलवाल, पार्थ खण्डेलवाल, बाबू लाल, भगवान, मुकेश, विष्णु, लखन, आशा खण्डेलवाल, सलोनी खण्डेलवाल सहित बड़ी संख्या में भक्त उपस्थित थे।