सगुण-निर्गुण भक्ति में अंतर नहीं, दृष्टिकोण का होता है भेद: संत दिग्विजय राम
रामद्वारा में शिव पुराण कथा के आठवें दिन संत दिग्विजय राम ने सगुण-निर्गुण भक्ति, शिवरात्रि और ईश्वर अनुभूति का महत्व बताया।
तस्वीर में चित्तौड़गढ़ जिले के रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान मंच पर प्रवचन देते संत दिग्विजय राम और कथा सुनने के लिए बैठे श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
बड़ी सादड़ी। चित्तौड़गढ़ जिले के रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के आठवें दिन संत दिग्विजय राम ने सगुण और निर्गुण भक्ति के संबंध में प्रवचन देते हुए कहा कि दोनों भक्ति मार्गों में कोई भेद नहीं है, बल्कि भेद व्यक्ति की दृष्टि और सोच में होता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि शास्त्रों में भगवान के कण-कण में विद्यमान होने की बात कही गई है। जब भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं तो मंदिर जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान की अनुभूति के लिए व्यक्ति को मंदिर जाना पड़ता है। ईश्वर खोजने से नहीं मिलते, बल्कि स्वयं में खो जाने से उनकी प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि राम सर्वत्र व्याप्त हैं। शिव के अतिरिक्त सभी देवताओं की पूजा मूर्ति के रूप में होती है, जबकि महादेव की पूजा मूर्ति और शिवलिंग दोनों रूपों में की जाती है।
कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने शिवरात्रि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति वर्षभर शिव मंदिर नहीं जाता है और शिव की आराधना व पूजा नहीं करता है, लेकिन केवल शिवरात्रि के दिन निराहार रहकर सच्चे भाव से भगवान शिव की पूजा करता है तो उसे वर्षभर की गई सेवा के समान फल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि सेवा हमेशा निष्कपट भाव से करनी चाहिए।
संत ने बताया कि शिव पुराण में उल्लेख है कि शिवरात्रि के दिन भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की पूजा की थी। इसी कारण महाशिवरात्रि के दिन शिव पूजा का विशेष महत्व माना गया है। उन्होंने शिव पूजा के लिए महाशिवरात्रि को अत्यंत महत्वपूर्ण दिन बताया।
रामद्वारा में चल रही शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम के प्रवचनों को सुनने के लिए श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के माध्यम से उन्होंने भक्ति, आस्था और ईश्वर अनुभूति के महत्व को समझाया।