बड़ी सादड़ी के रामद्वारा में शिव पुराण कथा: संत दिग्विजय राम बोले- नाम का आश्रय ही मुक्ति का मार्ग

चित्तौड़गढ़ के बड़ी सादड़ी स्थित रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम ने राम नाम, श्रवण भक्ति, कीर्तन और मनन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि महादेव की कृपा, भक्ति और पूजा के माध्यम से भवसागर से मुक्ति का मार्ग कैसे प्रशस्त होता है।

Update: 2026-08-04 11:40 GMT

तस्वीर में संत दिग्विजय राम चित्तौड़गढ़ के बड़ी सादड़ी स्थित रामद्वारा में माइक के सामने बैठकर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।

चित्तौड़गढ़ जिले के बड़ी सादड़ी स्थित रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि राम नाम का आश्रय लेने से महादेव की अति कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को नाम का आश्रय अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि इसी के माध्यम से भवसागर से मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने बताया कि शिव पुराण को प्रणाम करने मात्र से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त होता है।



 संत दिग्विजय राम ने कहा कि संसार में सुख का मिलना हरि कृपा है, लेकिन प्रभु के नाम का स्मरण अति हरि कृपा का स्वरूप है। उन्होंने कहा कि भगवान का सत्संग और कथा सुनना भी अति हरि कृपा है, क्योंकि हरि कृपा के बिना व्यक्ति सत्संग सुनने या प्रभु का एक नाम भी नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि मनुष्य शरीर से मानव हो सकता है, लेकिन यदि उसमें भक्ति नहीं है तो वह चार पैर वाले प्राणी के समान प्रतीत होता है।

उन्होंने कहा कि शिव पुराण ज्ञान, भक्ति और वैराग्य प्रदान करता है। शिव तत्व की प्राप्ति ही साध्य है और उस साध्य तक पहुंचने के लिए मानव शरीर ही सबसे बड़ा साधन है। शास्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि साधन तीन प्रकार के होते हैं—श्रवण, कीर्तन और मनन। हरि कृपा से व्यक्ति सत्संग का श्रवण करता है, कीर्तन में तन मस्त हो जाता है और जो सुना है उसे अपने हृदय में उतार लेता है, यही मनन की अवस्था है। उन्होंने कहा कि इन तीनों की उपलब्धता भी हरि कृपा से ही संभव होती है।

संत दिग्विजय राम ने आगे कहा कि शास्त्रों में भक्ति का मंगलाचरण भी श्रवण भक्ति से माना गया है। भक्ति के नौ प्रकार बताए गए हैं, जिनमें प्रथम स्थान श्रवण भक्ति का है। उन्होंने कहा कि भगवान की महिमा को केवल कानों से नहीं, बल्कि चित्त लगाकर सुनना चाहिए, तभी उसका वांछित फल प्राप्त होता है। सुनने के लिए आशक्ति आवश्यक है और यही आशक्ति श्रवण भक्ति को मजबूत करती है।

उन्होंने बताया कि श्रवण कानों से, कीर्तन पांव से और मनन मन से सिद्ध होता है, लेकिन ये तीनों महादेव की कृपा से ही प्राप्त होते हैं। यदि व्यक्ति इस मार्ग पर चल पड़े तो उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति शारीरिक कारणों से इन तीनों उपायों का पालन नहीं कर पाता तो महादेव की मूर्ति स्थापित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भी भवसागर पार कर सकता है। हालांकि इसके लिए मन में राग, द्वेष, ईर्ष्या, छल और कपट का अभाव होना आवश्यक है।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि भगवान शंकर की पूजा दो प्रकार से की जाती है—शिवलिंग की स्थापना कर तथा मूर्ति पूजा के माध्यम से। उन्होंने कहा कि भगवान शिव साकार और निराकार दोनों स्वरूपों में विराजमान हैं। इसलिए निराकार स्वरूप की उपासना शिवलिंग के रूप में तथा साकार स्वरूप की पूजा शिव मूर्ति के रूप में करना उपयुक्त बताया गया है।

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