चित्तौड़गढ़ की कालिका गोशाला में नानी बाई का मायरा कथा समापन पर पहुंचे संत दिग्विजयराम महाराज।

बड़ी सादड़ी। नरसीं मेहता और भक्त शिरोमणि मीरा बाई जैसी अटूट श्रद्धा, विश्वास और दासत्व भाव से की गई भक्ति के सामने भगवान भी दौड़े चले आते हैं। यह संदेश संत दिग्विजयराम महाराज ने चित्तौड़गढ़ जिले के नेतावल गढ़ पाछली गांव स्थित कालिका गोशाला में गौसेवार्थ आयोजित नानी बाई का मायरा कथा के समापन अवसर पर दिया। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने गौसेवा, तुला दान, शेड निर्माण और झोली में कुल 5.11 लाख रुपए का दान दिया। यह पूरी राशि गोशाला पर खर्च की जाएगी।

व्यासपीठ से संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि भक्ति हमेशा श्रद्धा, विश्वास और दासत्व भाव से करनी चाहिए। मीरां बाई की भक्ति ऐसी थी कि उन्हें दिया गया विष भी सांवलिया सेठ ने अमृत कर दिया। नरसीं भगत ने अपनी बेटी नानी बाई के ससुराल से आई मायरे के सामान की सूची और कंकुम पत्रिका भी ठाकुर जी को सौंप दी थी। इसके बाद वे संतों के साथ सवा मण गोपीचंदन और तुंबे लेकर बेटी के ससुराल पहुंच गए।


नरसीं भगत की इस स्थिति को देखकर उनके समधि श्रीरंग जी ने उन्हें गांव के बाहर टूटी-फूटी झोंपड़ी में ठहरा दिया। नरसीं भगत ने इसे प्रभु की इच्छा मानकर वहां रहना भी स्वीकार कर लिया। संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि हमें भी प्रतिकूलता को हरि इच्छा और अनुकूलता को हरि कृपा मानकर जीवन जीना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन्द्र का सिंहासन भी तीन लोक की फकीरी के सामने नतमस्तक हो गया था। प्रभु सेवा का अवसर पाने वाले लोग सौभाग्यशाली होते हैं।

कथा में नरसीं भगत और उनकी बेटी नानी बाई के प्रसंग का वर्णन करते हुए संत ने बताया कि नानी बाई को ससुराल वालों ने खूब ताने दिए। उनके देवर ने यहां तक कह दिया कि तुम्हारे पिता को देखकर तो हम लज्जित महसूस कर रहे हैं। इन बातों से दुखी नानी बाई रोती-बिलखती अपने पिता से मिलने झोंपड़ी में पहुंची। उसने पिता से पूछा कि आप कितना मायरा लाए हैं। उसने कहा कि जब भी वह कुछ कहती है, तो वे कीर्तन में व्यस्त हो जाते हैं। नानी बाई ने दुख जताते हुए कहा कि आज उसकी मां जिंदा होती तो उसे ऐसे दिन नहीं देखने पड़ते। उसने पूर्व जन्म के पापों के कारण अपने पिता जैसा पिता मिलने की बात भी कही।

नानी बाई का करुण क्रंदन सुनकर नरसीं भगत भी व्याकुल हो गए। उन्होंने बेटी को वचन दिया कि नानी, तुम अपने घर जाओ। अब या तो मेरे सांवलिया सेठ मायरा भरने आएंगे, नहीं तो संसार में मायरा भरने की रीत ही समाप्त हो जाएगी। संत ने इसे एक भक्त का अटूट भरोसा बताया।

कथा के अनुसार, आखिरकार श्रीसांवलिया सेठ भक्त की पुकार सुनकर राधा-रुकमणी को साथ लेकर सेठ का रूप धारण करके पहुंचे और छप्पन करोड़ रुपए का मायरा भरकर नरसीं भगत की लाज रखी। भगवान ने नानी बाई के ससुराल वालों को अपना परिचय नरसिंह भगत के मुनीम के रूप में दिया।

संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि चित्तौड़ दुर्ग की प्राचीरें आज भी मीरा बाई के नाम को जागृत करती हैं। भक्ति के लिए चित्तौड़ को मीरां के रूप में जाना जाता है। कथा के दौरान गौसेवा के उद्देश्य से श्रद्धालुओं ने तुला दान, गौसेवा, शेड निर्माण और झोली में कुल 5.11 लाख रुपए की राशि अर्पित की। आयोजकों के अनुसार, दान की पूरी राशि गोशाला पर खर्च की जाएगी।

नानी बाई का मायरा कथा के समापन पर माहौल भावुक हो गया और महिलाएं अपने आंसू नहीं रोक पाईं। इस अवसर पर संत दिग्विजयराम महाराज से कालिका गोशाला का संरक्षक बनने का आग्रह किया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। कथा के समापन के साथ गौसेवा के लिए जुटाई गई 5.11 लाख रुपए की राशि और संत दिग्विजयराम महाराज की संरक्षक की जिम्मेदारी स्वीकार करने का निर्णय आयोजन के प्रमुख पक्ष रहे।

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