बड़ी सादड़ी में छात्र क्रिश चौधरी द्वारा कैमरे में दर्ज किया गया दुर्लभ इंडियन मून मॉथ, जो क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाता है।

बड़ी सादड़ी में 11वीं कक्षा के छात्र क्रिश चौधरी ने अपनी वन्यजीव फोटोग्राफी के जरिए क्षेत्र की जैव विविधता की एक खास झलक सामने रखी है। एक्सप्लोरर्स टीम के साथ नियमित रूप से नेचर ट्रेक और वाइल्ड ट्रेक में शामिल होने वाले क्रिश ने हाल ही में तीन अलग-अलग प्रजातियों के मॉथ यानी पतंगों का अवलोकन कर उनकी तस्वीरें कैमरे में कैद कीं। इनमें दुर्लभ और आकर्षक इंडियन मून मॉथ (Actias selene) प्रमुख रहा। इसके अलावा, उनकी तस्वीरों में सफेद और पीले रंग के दो जियोमीटर मॉथ (Geometer Moths) भी दर्ज हुए। विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रजातियों का अवलोकन क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता का सकारात्मक संकेत है।

क्रिश के शिक्षक रहे वन्यजीव विशेषज्ञ सुनील कुमार के अनुसार, इंडियन मून मॉथ सैटर्निडी (Saturniidae) परिवार का सदस्य है। इसे भारत के सबसे सुंदर जायंट सिल्क मॉथ में गिना जाता है। इसके विशाल, हल्के हरे यानी मिंट ग्रीन रंग के पंख, प्रत्येक पंख पर बने पारदर्शी आई स्पॉट्स और पीछे की ओर निकली लंबी, रिबन जैसी पूंछ इसे दुनिया के सबसे आकर्षक पतंगों में शामिल करती है।

इंडियन मून मॉथ की लंबी पूंछ केवल इसकी पहचान या सुंदरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चमगादड़ों से बचाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, चमगादड़ जब इकोलोकेशन यानी ध्वनि तरंगों के माध्यम से इसका शिकार करने का प्रयास करते हैं, तो कई बार वे मॉथ के शरीर के बजाय उसकी पूंछ पर हमला कर बैठते हैं। इससे मॉथ को सुरक्षित बच निकलने का अवसर मिल जाता है। प्रकृति में विकसित इस रक्षा तंत्र को बेहद अनोखा माना जाता है।

इस मॉथ का जीवन चक्र भी विशेष है। इसका विकास अंडा, इल्ली (कैटरपिलर), कोया (ककून) और वयस्क मॉथ के चार चरणों से होकर गुजरता है। कैटरपिलर कई सप्ताह तक आम, अमरूद, जामुन, बेर और अन्य चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों की पत्तियां खाकर तेजी से बढ़ता है। इसके बाद वह रेशम का मजबूत कोया बनाता है। इसी कोये के भीतर पूर्ण कायांतरण (Metamorphosis) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद वह सुंदर वयस्क मॉथ के रूप में बाहर निकलता है।

इंडियन मून मॉथ की एक और खास विशेषता यह है कि वयस्क अवस्था में यह भोजन नहीं करता। इसका मुंह अविकसित होता है, इसलिए यह अपने पूरे वयस्क जीवन में केवल कैटरपिलर अवस्था के दौरान संचित ऊर्जा के सहारे जीवित रहता है। इसका सामान्य जीवनकाल 5 से 10 दिन का होता है। इस अवधि में इसका मुख्य उद्देश्य साथी की खोज, प्रजनन और अगली पीढ़ी के लिए अंडे देना होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, नर इंडियन मून मॉथ के पंखनुमा एंटेना (Feathery Antennae) अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इनकी मदद से वह कई किलोमीटर दूर मौजूद मादा द्वारा छोड़े गए फेरोमोन को भी पहचान सकता है। यह क्षमता कीट जगत की सबसे विकसित घ्राण प्रणालियों में से एक मानी जाती है।

रात्रिचर होने के कारण इंडियन मून मॉथ रात में सक्रिय रहता है। कृत्रिम रोशनी की ओर आकर्षित होने के चलते यह अक्सर घरों, खेतों और बिजली के खंभों के आसपास दिखाई देता है। यह पूरी तरह हानिरहित है और मनुष्यों को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाता। इसके बजाय, यह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्रिश की फोटोग्राफी में दर्ज सफेद और पीले रंग के जियोमीटर मॉथ भी अपनी विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं। ये मॉथ उत्कृष्ट छलावरण (Camouflage) के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके कैटरपिलर को इंचवर्म कहा जाता है, क्योंकि वे अपने शरीर को मोड़कर इंच-इंच आगे बढ़ते हैं। जियोमीटर मॉथ भी खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पक्षियों, चमगादड़ों तथा अन्य वन्यजीवों के भोजन का स्रोत बनते हैं।

एक्सप्लोरर्स टीम का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल भ्रमण तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें जैव विविधता की पहचान, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, वन्यजीव फोटोग्राफी और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना है। टीम के साथ नियमित रूप से प्रकृति के बीच सीखने वाले क्रिश की यह उपलब्धि दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन और प्रत्यक्ष अवलोकन से विद्यार्थी भी दुर्लभ प्रजातियों का रिकॉर्ड तैयार करने में योगदान दे सकते हैं और समाज में संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ा सकते हैं।

व्याख्याता सुनील कुमार का मानना है कि इस तरह के अवलोकन भविष्य में स्थानीय जैव विविधता के वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। क्रिश चौधरी के कैमरे में कैद तीनों मॉथ प्रजातियां केवल आकर्षक तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के प्रति नई पीढ़ी की जिज्ञासा, रुचि और संरक्षण की भावना को सामने लाने वाला उदाहरण भी हैं।

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