फैक्ट्री के कारखाने और गोदाम में रखे स्टेनलेस स्टील के बड़े रोल्स और कॉइल्स का दृश्य।

भारत सरकार देश में 'मेक इन इंडिया' अभियान को लगातार बढ़ावा देने की बात करती है और इसके लिए कई तरह की घोषणाएं भी की जाती हैं। लेकिन, देश के स्टेनलेस स्टील (SS) सेक्टर से एक ऐसी खबर सामने आई है जो घरेलू निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बन गई है। सरकार के एक हालिया फैसले के कारण घरेलू बाजार में सस्ते और कम गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील का आयात बहुत तेजी से बढ़ा है, जिससे भारतीय उत्पादकों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि इस साल जुलाई महीने में स्टेनलेस स्टील के आयात में पिछले साल के मुकाबले 165 फीसदी की भारी-भरकम बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वजह से देश में स्टेनलेस स्टील बनाने वाली कंपनियां काफी परेशान हैं।

अगर हम पूरी स्थिति को समझें तो मेटल, खास तौर पर स्टील और स्टेनलेस स्टील के उत्पादन में चीन का दुनिया भर में दबदबा है। भारत में भी चीन से बड़ी मात्रा में स्टील आता रहा है। लेकिन भारतीय बाजार को सस्ते और सबसे जरूरी, घटिया क्वालिटी के स्टील या स्टेनलेस स्टील के आयात से बचाने के लिए सरकार ने पर्याप्त इंतजाम किए थे। इसके लिए सरकार की तरफ से 'क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर' (QCO) जारी किया गया था। इस ऑर्डर का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि देश में केवल अच्छी गुणवत्ता वाला स्टील ही आयात हो। इस QCO की वजह से घटिया या कमतर क्वालिटी के स्टील का आयात काफी हद तक धीमा पड़ गया था। लेकिन, इसी साल अप्रैल के महीने में सरकार ने इस क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर को वापस ले लिया। सरकार के इस फैसले के बाद से ही स्टील और स्टेनलेस स्टील का आयात अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है। और जैसा कि अंदेशा था, इस धातु का सबसे ज्यादा आयात चीन से ही हो रहा है, जिससे भारतीय स्टील उत्पादकों के कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ने लगा है।

इस साल अप्रैल में जब से क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर वापस लिया गया, भारतीय आयातक (इंपोर्टर्स) तुरंत सक्रिय हो गए। चाइनीज कंपनियों से स्टील की खरीदारी शुरू हुई और इसके नतीजे जून महीने के आंकड़ों में साफ दिखने लगे। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले साल जून के महीने में देश में कुल 66,362 टन स्टेनलेस स्टील का आयात हुआ था। लेकिन इस साल जून में यह आंकड़ा बढ़कर 1,11,884 टन पर पहुंच गया। इसका सीधा मतलब यह है कि साल-दर-साल के आधार पर केवल जून में ही आयात में 69 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। लेकिन जुलाई महीने के आंकड़े तो और भी ज्यादा चौंकाने वाले और खतरनाक रुझान की तरफ इशारा करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल जुलाई में कुल 68,601 टन स्टेनलेस स्टील का आयात किया गया था, जो कि इस साल जुलाई में बढ़कर 1,82,117 टन के स्तर पर पहुंच गया। यानी, साल-दर-साल के आधार पर देखें तो आयात में 165 फीसदी की बहुत तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

स्टील सेक्टर के विशेषज्ञों और जानकारों का कहना है कि सरकार द्वारा क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर वापस लेने का सीधा असर यह हुआ है कि अब स्टेनलेस स्टील से सामान बनाने वाले निर्माताओं (फेब्रिकेटर्स) के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल करना अनिवार्य नहीं रह गया है। वे सस्ते के चक्कर में निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल का उपयोग कर सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले जहां आमतौर पर 304 ग्रेड के स्टेनलेस स्टील का उपयोग होता था (जो अच्छी क्वालिटी का माना जाता है), अब उसकी जगह पर 200 ग्रेड के घटिया स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल धड़ल्ले से शुरू हो गया है। हालांकि इससे उत्पादकों के लिए तो कच्चा माल सस्ता पड़ता है और उनकी लागत कम होती है, लेकिन इसका खामियाजा अंत में उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो उन सामानों का इस्तेमाल करते हैं (एंड-यूजर्स)। सबसे गंभीर बात यह है कि यदि इस घटिया क्वालिटी के रॉ मैटेरियल का इस्तेमाल फूड स्टोरेज का सामान (जैसे बर्तन या डिब्बे) बनाने में किया जा रहा है, तो वह लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत घातक हो सकता है। घटिया मेटल खाने-पीने की चीजों के संपर्क में आने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां खड़ी कर सकता है।

देश में स्टेनलेस स्टील के अग्रणी उत्पादक जिंदल स्टेनलेस के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) तरुण खुल्बे ने इस स्थिति पर अपनी गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है, "चीन से आने वाला सस्ता स्टेनलेस स्टील घरेलू स्टील निर्माताओं के लिए इस समय एक बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारतीय आयातक वहां से कम गुणवत्ता वाला स्टील लाते हैं जो कि काफी सस्ता पड़ता है। चीन से आने वाले उस स्टील की कीमत इतनी कम होती है कि हम उस कीमत पर यहां बेहतर क्वालिटी का स्टील दे ही नहीं सकते हैं।" खुल्बे ने आगे बताया कि इससे न केवल उनकी वर्तमान बिक्री प्रभावित हो रही है, बल्कि कंपनियों के भविष्य के ग्रोथ प्लान (विकास योजनाओं) पर भी बुरा असर पड़ता है। जब कंपनियां मौजूदा बाजार में ही संघर्ष कर रही हों, तो वे विस्तार की योजनाएं कैसे बना सकती हैं? उनका मानना है कि यह स्थिति लंबी अवधि में कंपनियों की मैन्यूफैक्चरिंग कंपीटिटिवनेस (विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता) को बुरी तरह प्रभावित करती है।

भारत की पहचान स्टील क्षेत्र में बहुत मजबूत रही है और क्रूड स्टील बनाने के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। पिछले साल दिसंबर में जब स्टील के आयात पर टैरिफ लगाया गया था, तो उस समय चीन से होने वाला आयात कुछ सस्ता हुआ था। लेकिन अब, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर हटते ही स्टील के इंपोर्ट में बहुत तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है। इस नीतिगत बदलाव का देश के व्यापार संतुलन पर भी असर पड़ा है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल अप्रैल महीने से पहले भारत स्टील का 'नेट एक्सपोर्टर' था, यानी हम जितना स्टील आयात करते थे, उससे ज्यादा विदेशों को निर्यात करते थे। लेकिन, मौजूदा हालात में भारत अब एक 'नेट इंपोर्टर' देश बन गया है, यानी हम स्टील निर्यात करने से ज्यादा अब दूसरे देशों से मंगा रहे हैं।