सद्गुरु की कृपा बिना मोह-अज्ञान से मुक्ति नहीं: आचार्य रामदयालजी महाराज, रक्तदान शिविर में 57 यूनिट रक्त संग्रहित
भीलवाड़ा के माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित दैनिक चातुर्मासिक सत्संग में आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने सद्गुरु की कृपा, सहनशीलता और आध्यात्मिक जीवन पर विचार रखे। वहीं रक्तदान शिविर में 57 यूनिट रक्त संग्रहित हुआ और रक्तदाताओं को सम्मानित किया गया।
तस्वीर में भीलवाड़ा के रामद्वारा धाम में आयोजित चातुर्मास सत्संग के दौरान मंच पर बैठे रामस्नेही संप्रदाय के पीठाधीश्वर आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज और अन्य संत नजर आ रहे हैं।
भीलवाड़ा, 3 अगस्त। अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि जिनकी रचना भगवान ने की है, उसे नरक में जाना पड़ सकता है, लेकिन जिसकी रचना सद्गुरु ने की है, नरक उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता और वह नारायण का धाम बन जाता है। उन्होंने कहा कि सद्गुरु की कृपा के बिना जीवन मोह और अज्ञान से मुक्त नहीं हो सकता तथा उसी की कृपा से ज्ञानी और साधक हर परिस्थिति में गंभीर बने रहते हैं।
सोमवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि सुनना और सहना, जिसके जीवन में है, वही कुंदन बनता है। उन्होंने कहा कि आज यही दोनों गुण कमजोर हो गए हैं, इसलिए परिवार, समाज और राष्ट्र टूटते-बिखरते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को सुनाना तो पसंद है, लेकिन सुनना पसंद नहीं है। जीवन में छोटी-सी मुसीबत आने पर लोग घबरा जाते हैं, जबकि शिष्य के जीवन को संवारने और उसे कठिन परिस्थितियां सहने के लिए तैयार करने का कार्य सद्गुरु करते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में अनेक परीक्षाएं आती हैं, लेकिन सहन करने की क्षमता कमजोर होने के कारण लोग थोड़े से शब्दों से ही आहत हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु को शंकर इसलिए कहा जाता है क्योंकि वही विष पीने की ताकत और संकट को हरने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है, लेकिन नारी ताड़का, सूर्पणखा और केकयी जैसी नहीं होनी चाहिए, जिनका नाम भी कोई अपने घर में नहीं रखना चाहता। नाम उसी पर रखे जाते हैं, जो पूजनीय होती है।
सत्संग में आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि मनुष्य का जीवन पानी के समान है। जैसे पात्र भले बदल जाए, लेकिन प्यास केवल पानी से ही बुझती है, उसी प्रकार संसार के सभी शास्त्र सामने होने पर भी गुरु की कृपा के बिना तत्व की प्राप्ति और गोविन्द का साक्षात्कार संभव नहीं है।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के विश्राम के बाद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती उतारी। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। सुबह 8:30 बजे से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ होता है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। सायंकाल संध्या आरती और रामधुनी के उपरांत रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर वाले भक्तमाल पर कथा एवं प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म संदेश दे रहे हैं।
इससे पूर्व रविवार को रामद्वारा धाम परिसर में आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज के सानिध्य में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चले इस शिविर में कुल 57 यूनिट रक्त संग्रहित किया गया। रक्त संग्रहण का कार्य रामस्नेही चिकित्सालय ब्लड बैंक की टीम ने किया। इस अवसर पर आचार्यश्री ने रक्तदाताओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि रक्तदान के माध्यम से किसी प्राणी का जीवन बचाने में सहयोग किया जा सकता है। उन्होंने रक्तदान को महादान बताते हुए इसे मानव सेवा का अनमोल कार्य कहा और मुस्कराते हुए मन में राम-राम का स्मरण करते हुए रक्तदान करने का संदेश दिया। शिविर के दौरान उन्होंने सभी रक्तदाताओं को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए। चातुर्मास के दौरान आयोजित धार्मिक प्रवचनों के साथ सेवा और जनकल्याण के ऐसे आयोजन श्रद्धालुओं की सक्रिय भागीदारी के साथ निरंतर जारी हैं।