भीलवाड़ा चातुर्मास सत्संग में आचार्य रामदयालजी महाराज बोले, सुख चाहिए तो किसी को दुःख देना बंद करें

भीलवाड़ा के माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में विश्व शांति कल्याण चातुर्मास के दैनिक सत्संग में आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने सद्गुरू के सामर्थ्य, भक्ति, वैराग्य और जीवन में सुख पाने के लिए दूसरों को दुःख न देने का संदेश दिया। श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या रही।

Update: 2026-08-04 13:16 GMT

तस्वीर में माणिक्यनगर रामद्वारा धाम के सत्संग हॉल में बड़ी संख्या में बैठी महिला श्रद्धालु नजर आ रही हैं।

भीलवाड़ा, 4 अगस्त। माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में विश्व शांति कल्याण चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि मानव शरीर परमात्मा प्रदान करता है, लेकिन इस शरीर का कल्याण सद्गुरू के सामर्थ्य से ही संभव होता है। उन्होंने कहा कि समर्थ गुरू राग से भरे जीवन में भी वैराग्य की स्थापना कर देते हैं। परमात्मा भवसागर में डूबने के लिए स्थान देता है, लेकिन गुरू का सामर्थ्य ही जीव को भवसागर से पार कराता है। उन्होंने कहा कि गुरू का सामर्थ्य ही यम के त्रास से मुक्ति दिला सकता है।



 मंगलवार को आयोजित सत्संग में आचार्यश्री ने कहा कि स्वामी रामचरणजी महाराज ने समर्थ गुरू के चरणों में बैठकर जिस सामर्थ्य को प्राप्त किया, उसी को उन्होंने अभिव्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सद्गुरू की कृपा से ही जीवन में अज्ञान का अंधकार दूर होता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है। जीव में स्वयं देखने का सामर्थ्य नहीं होता, लेकिन परमात्मा और गुरू की शक्ति से ही वह देख पाता है। उन्होंने कहा कि पुरुषार्थ मनुष्य का होता है, जबकि सामर्थ्य गुरूदेव का होता है।

आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि इस संसार में वही व्यक्ति वास्तव में हमारा अपना होना चाहिए, जो सत्संग में भी हमारे साथ आए। केवल आमोद-प्रमोद में साथ देने वाला व्यक्ति सच्चा अपना नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि मनुष्य रिश्ते-नातों में उलझा रहता है, जबकि जन्म-मरण का सिलसिला अनंत है और जीवात्मा के शरीर बदलते ही रिश्ते भी बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि केवल परमात्मा से ही हमारा संबंध स्थायी हो सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सुख चाहिए तो किसी को भी दुःख नहीं देना चाहिए। माता-पिता, पति-पत्नी, संतान और मित्र, जिनसे भी हम सुख की अपेक्षा करते हैं, उन्हें दुःख नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यवहार हमें अपने लिए पसंद नहीं है, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। यदि हमें सम्मान का अमृत चाहिए तो दूसरों के लिए अपमान का हलाहल तैयार नहीं करना चाहिए।

आचार्यश्री ने कहा कि ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था का नाम संत है और जो महानता प्रदान करे वही संत कहलाता है। उन्होंने कहा कि जब तक ज्ञान हमारे पास नहीं होगा, तब तक हम गुरू की समर्थता के पात्र नहीं बन सकते। गुरू के सामर्थ्य से प्राप्त ज्ञान से भक्ति बढ़ती है और सद्गुरू के सामर्थ्य से बढ़ने वाली भक्ति से वैराग्य का विकास होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में सद्गुरू की कृपा से ही मुक्ति प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि जिसे गुरू प्रिय नहीं होता, उससे बड़ा बदनसीब कोई नहीं है। आज के समय में लोग अपना स्वार्थ पूरा नहीं होने पर गुरू और गोविन्द को कोसने में भी देर नहीं करते। उन्होंने कहा कि जीव का सुखी या दुःखी होना कर्मवाद है, जबकि परमात्मा की भक्ति प्राप्त होना गुरू का समर्थवाद है। सत्संग में भजन भी वही कर सकता है, जिस पर गुरू की कृपा होती है।

आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम के बाद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सत्संग का आयोजन किया जा रहा है। सुबह 8:30 बजे से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ हो रहा है। वहीं सूर्यास्त के समय संध्या आरती तथा रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत श्री रामजस जी ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

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