गंगापुर, भीलवाड़ा। गंगापुर नगरपालिका चुनाव की सरगर्मियों के बीच शनिवार को शहर में सियासत का ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसकी चर्चा चाय की थड़ियों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक होती रही। पिछले करीब तीन साल से जिन पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं से दूरी बनाकर चलने की चर्चाएं थीं, उन्हीं की चौखट पर अचानक दस्तक ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए।

सियासी गलियारों में चटखारे लेकर चर्चा है कि अब तक अपने प्रभाव और पकड़ का रौब दिखाने वाले ‘मिस्टर 20 प्रतिशत’ को जैसे ही अपनी साख दांव पर लगती नजर आई, तेवरों में अचानक नरमी आ गई। शनिवार को पुराने कार्यकर्ताओं से मेल-मुलाकात का दौर चला तो लोगों ने इसे सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना।

सबसे ज्यादा चर्चा उन मुलाकातों की रही, जिनमें गोल्ड शो-रूम से लेकर काले कोट वालों के ठिकानों तक पहुंचने की राजनीतिक कवायद नजर आई। शहर में दिनभर इन मुलाकातों के अलग-अलग मायने निकाले जाते रहे। कोई इसे टिकट की चिंता बता रहा था तो कोई बिगड़े रिश्तों को चुनाव से पहले जोड़ने की मजबूरी बता रहा था।

मजेदार बात यह रही कि जिन पुराने कार्यकर्ताओं की पिछले कुछ समय से कथित तौर पर पूछ कम हो गई थी, चुनावी मौसम आते ही उन्हीं की चौखट पर सियासी गर्मजोशी दिखाई देने लगी। समर्थकों के बीच सवाल भी तैरने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि तीन साल की दूरी एक ही शनिवार में सिमट गई?

गंगापुर की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग इसे चुनावी गणित का असर बता रहे हैं। नगरपालिका चुनाव में हर वार्ड का समीकरण महत्वपूर्ण है और ऐसे में पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी किसी के लिए भी भारी पड़ सकती है। यही वजह है कि जिन चेहरों को कल तक नजरअंदाज किया जा रहा था, आज उन्हीं के दरवाजे पर दस्तक देने का दौर दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक व्यंग्य में कहा जाए तो ‘कुर्सी दूर दिखी तो तेवर गर्म, कुर्सी खतरे में दिखी तो कदम नरम’ वाली कहावत गंगापुर की सियासत पर सटीक बैठती नजर आ रही है।

शहर में यह भी चर्चा है कि चुनाव आते ही पुराने रिश्तों की धूल झाड़ने का अभियान शुरू हो गया है। कहीं चाय पर चर्चा है, कहीं बंद कमरे में मुलाकात और कहीं वर्षों पुराने राजनीतिक रिश्तों को फिर से गर्माने की कोशिश।

हालांकि इन मुलाकातों का वास्तविक राजनीतिक असर चुनावी मैदान में ही सामने आएगा, लेकिन शनिवार का नजारा इतना जरूर बता गया कि गंगापुर की सियासत में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं—बस चुनावी मौसम और बदलते समीकरण होते हैं।

अब देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘सरेंडर पॉलिटिक्स’ महज टिकट तक सीमित रहती है या चुनावी मैदान में पुराने कार्यकर्ताओं का भरोसा भी वापस जीत पाती है।

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