तस्वीर में संत दिग्विजयराम महाराज चित्तौड़गढ़ के रामद्वारा में शिव पुराण कथा के दौरान माइक पर प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।

चित्तौड़गढ़ के रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के सत्रहवें दिन शुक्रवार को संत दिग्विजयराम महाराज ने प्रणाम, तिलक और पार्थिव पूजन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के साथ ही प्रणाम करने की परंपरा सभी धर्मों में है और प्रणाम मनुष्य जीवन के कई परिणाम बदल देता है।

संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि सनातन धर्म में दंडवत प्रणाम करने की परंपरा वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरी उतरी है। इससे स्वास्थ्य लाभ होता है। प्रणाम करने से विद्या, यश और बल बढ़ता है।



 उन्होंने कहा कि तिलक आस्था और धर्म का प्रतीक है, लेकिन आज्ञा चक्र पर चंदन का तिलक लगाने से शीतलता प्रदान होती है। जिस कार्य को भोग और सिद्धि की कामना से किया जाता है, उसे पूजा कहते हैं। शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश की पूजा करने से पूरे वर्ष की गई पूजा का फल प्राप्त होता है।

संत ने मिट्टी से निर्मित पार्थिव प्रतिमाओं के पूजन का महत्व बताते हुए कहा कि यह पूजा अकाल मृत्यु को हरने वाली मानी जाती है। महिला और पुरुष दोनों इनकी पूजा कर सकते हैं। पार्थिव प्रतिमा का निर्माण पोखर, तालाब और पानी से ढकी मिट्टी से करना श्रेष्ठ माना गया है। हालांकि, मिट्टी की मूर्ति केवल भगवान गणेश, शिव, विष्णु और माता दुर्गा की ही निर्मित करने का विधान है।

संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ पार्थिव पूजन शिवलिंग का माना गया है। पार्थिव शिवलिंग के अभिषेक से आत्म शुद्धि, पुष्प अर्पित करने से पुण्य और प्रसाद अर्पित करने से आयु वृद्धि होती है। धूप और दीप प्रज्वलित करने से धन और ज्ञान की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि कार्तिक मास में किया गया दान-पुण्य सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

स्वतंत्रता दिवस को लेकर संत ने कहा कि राम धर्म के साथ राष्ट्र धर्म भी जरूरी है। शुक्रवार को रामद्वारा में विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में अखंड भारत दिवस मनाया गया। इस आयोजन के दौरान धार्मिक आस्था के साथ राष्ट्र धर्म के महत्व का संदेश भी दिया गया।

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