गुस्सा सुधार का माध्यम, क्रोध सर्वनाश का कारण: आचार्य रामदयालजी महाराज ने बताए जीवन के सूत्र
भीलवाड़ा के माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने गुस्से और क्रोध का अंतर बताते हुए शिक्षक, सैनिक और संत के सम्मान का संदेश दिया।
तस्वीर में मंच पर सफेद वस्त्रों में आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज व्यासपीठ पर विराजमान होकर माइक के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे हैं, तथा उनके बाईं ओर अन्य संत बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं।
भीलवाड़ा, 1 अगस्त। माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के अंतर्गत शनिवार को दैनिक सत्संग में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने गुस्से और क्रोध के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि जीवन में किसी को सुधारने के लिए गुस्सा आवश्यक हो सकता है, लेकिन क्रोध से हमेशा बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि महाभारत इस बात का साक्षी है कि यदि भीष्म पितामह समय पर क्रोध कर लेते तो उन्हें अनंत काल तक शूलों की शय्या पर नहीं सोना पड़ता।
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि हमारा गुस्सा सामने वाले के हित में हो सकता है, जबकि क्रोध व्यक्ति को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसी कारण क्रोध को चांडाल कहा गया है। उन्होंने कहा कि गुस्से में व्यक्ति को अपने भले-बुरे का ज्ञान बना रहता है, जबकि क्रोध की अवस्था में वह सब कुछ भूलकर अपना ही सर्वनाश कर बैठता है। उनके अनुसार गुस्सा आना मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है। परमार्थ और कल्याण की पूर्ति के अभाव में उत्पन्न होने वाली उत्तेजना गुस्सा कहलाती है। माता-पिता का गुस्सा सदैव संतान के हित में होता है और उसे संस्कारी तथा सभ्य बनाने का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि गुस्से में भी कल्याण की भावना होना आवश्यक है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मस्थल नहीं जा पाने से जो उत्तेजना उत्पन्न होती है, वह गुस्सा है, जबकि सिनेमा हॉल नहीं जा पाने पर आने वाली उत्तेजना क्रोध होती है। उन्होंने कहा कि यदि क्रोध में बुद्धि का नाश हो जाए तो जीवन भी नष्ट हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह चिंतन करना चाहिए कि क्रोध क्यों आता है। उन्होंने कहा कि कामनाओं की पूर्ति नहीं होने से उत्पन्न होने वाली उत्तेजना का नाम क्रोध है। मन की वक्रता और इन्द्रियों की कुटिलता के कारण मानव जन्म-जन्मांतर से भटकता आया है।
सत्संग के दौरान आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने एमएलवी राजकीय महाविद्यालय के आचार्यों का सम्मान करते हुए कहा कि शिक्षा के लिए शिक्षक, धरती की रक्षा के लिए सैनिक और धर्म के लिए संत राष्ट्र की धरोहर हैं। इन्हें हर समय सजग और सतर्क रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्तित्वों का सदैव सम्मान और आदर किया जाना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि शिष्य जो कुछ भी बनता है, वह सद्गुरू की कृपा से ही बनता है। शिष्य कितना भी सम्पन्न क्यों न हो, वह गुरू के समक्ष तुच्छ होता है। उन्होंने कहा कि शिष्य को कभी स्वयं को ज्ञानी और गुरू को अज्ञानी नहीं मानना चाहिए। शिष्य में सदैव विनम्रता और सीखने का भाव होना चाहिए। आचार्य के आगमन पर संत और भक्तों को खड़े होकर उनका सम्मान करना चाहिए तथा संत और आचार्य के बीच के अंतर को भी समझना चाहिए।
आचार्य श्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक सत्संग तथा सुबह 8:30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय आयोजित संध्या आरती में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
आयोजकों के अनुसार 2 अगस्त 2026 को रामस्नेही चिकित्सालय द्वारा रक्तदान शिविर आयोजित किया जाएगा। वहीं दोपहर 3:00 बजे से 5:00 बजे तक श्वासों श्वास राम नाम साधना मंडल द्वारा साधना शिविर का आयोजन होगा। इन कार्यक्रमों को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह बना हुआ है।