आचार्य रामदयालजी महाराज बोले: अपने अवगुण देखे बिना नहीं मिलेगी मुक्ति, अहंकार है अज्ञान की पराकाष्ठा
भीलवाड़ा के माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास सत्संग में आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने अहंकार, कृतघ्नता और आत्मचिंतन पर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अपने अवगुण देखे बिना मुक्ति संभव नहीं है।
तस्वीर में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाधीश्वर आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में सत्संग को संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।
भीलवाड़ा, 6 अगस्त। अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने स्वयं के अवगुण नहीं देखेगा, तब तक उसे मुक्ति नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा कि केवल स्वयं को ही श्रेष्ठ मानना अज्ञान की पराकाष्ठा है और यह अहंकार की तुष्टि मात्र है। वे गुरुवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग को संबोधित कर रहे थे।
आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति अपनी कमियों को छिपाने और दूसरों की कमियों को प्रकट करने की प्रवृत्ति रखता है। अपने दोषों को छिपाकर गुण बताने की सोच के कारण ही वह अपने से बड़े लोगों में भी अवगुण देखने लगता है। उन्होंने कहा कि स्वयं को श्रेष्ठ मानने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब कोई यह कहता है कि “मैं ही श्रेष्ठ हूं”, तो इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात कोई नहीं हो सकती। यह अज्ञान की पराकाष्ठा और अपने अहंकार को संतुष्ट करने का प्रयास है।
उन्होंने कहा कि यदि हमारे जीवन में किसी का राई बराबर भी अनुग्रह रहा है, तो उसे पर्वत के समान मानकर जीवनभर उसका सम्मान करना चाहिए। माता-पिता, गुरु, वेद और शास्त्रों में कमी देखने वाले व्यक्ति को कृतघ्न कहा जाता है। उन्होंने कहा कि वानर, भालू जैसे अनेक जानवर इंसान का साथ देते हैं, लेकिन इंसान उनका साथ नहीं देता। जानवर विश्वासघात नहीं करता, जबकि इंसान प्रलोभन में आकर विश्वासघात कर बैठता है।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि संसार में कृतघ्नता जैसा कोई पाप नहीं हो सकता। कृतघ्न व्यक्ति किसी के भी गुण को स्वीकार नहीं करता और उपकार को अपकार में बदल देता है। जो व्यक्ति उस पर कृपा करने वाले का ही अहित करता है, उससे बड़ा अज्ञानजन्य पाप कोई नहीं हो सकता।
उन्होंने विभिन्न दृष्टांतों के माध्यम से धर्म संदेश देते हुए कहा कि सिद्धांत आत्मा है और दृष्टांत उसका कलेवर। किसी भी बात को बिना दृष्टांत के समझना कठिन होता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने वाला ही वास्तव में परमात्मा का होता है।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के विश्राम के बाद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। सुबह 8.30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ होता है। वहीं सूर्यास्त के समय संध्या आरती तथा रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।