जगत से जाओ तो नेत्र दे जाओ, ताकि कोई दूसरा दुनिया देख सके: आचार्य रामदयालजी
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आचार्य रामदयालजी महाराज ने नेत्रदान को जीवन सार्थक करने वाली सेवा बताया। सत्संग में अंतिम समय राम नाम के स्मरण, जीव दया और अंतर चक्षु खोलने का संदेश दिया गया।
तस्वीर में आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज गुलाबी वस्त्र धारण किए हुए मंच पर बैठे हैं और माइक के जरिए प्रवचन दे रहे हैं।
भीलवाड़ा, 25 अगस्त। “जैसी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि होगी और दृष्टि है तो सृष्टि है।” माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित दैनिक चातुर्मासिक सत्संग में अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने नेत्रदान को जीवन को सार्थक बनाने वाली सेवा बताते हुए कहा कि जब संसार से विदा होने का समय आए तो जिन आंखों से हमने दुनिया देखी है, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के लिए दे जाना चाहिए जिसे इस जगत को देखने की जरूरत है।
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने मंगलवार को “विश्व शांति कल्याण” चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में नेत्रदान के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि देहदान और नेत्रदान सेवा का पुनीत कार्य है। कोई भी दान करे तो वह कई गुना बढ़कर वापस प्राप्त होता है। नेत्रदान करने वालों को परमात्मा के दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद शरीर राख हो जाए, उससे अच्छा है कि वह किसी के काम आए। हमारे महापुरुषों ने भी नेत्रदान किए हैं। जिसे नेत्र प्राप्त होते हैं, वह जगत के दर्शन कराने वाले के प्रति अपना अहोभाव कभी कम नहीं कर सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि मृत्यु का समय आए तो मुख से केवल राम का नाम निकलता रहे, तो आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है और संसार में किसी योनि में नहीं आना पड़ता। मरते समय जिस भाव के साथ देह का त्याग होता है, उसी के अनुसार शरीर की प्राप्ति होती है। यदि मृत्यु के समय किसी व्यक्ति का मन मकान या सांसारिक सुखों में रह जाए तो उसकी गति बिगड़ जाती है। अंतिम समय में परमात्मा के अलावा किसी अन्य का चिंतन नहीं करना चाहिए। मरते समय राम नाम लेने और सुनने से जीवन का उद्धार हो जाता है।
उन्होंने कहा कि हम किसी को कुछ भी कहें, लेकिन सामने वाला वैसा ही कह दे तो अहंकार को चोट लगती है। याद रखना चाहिए कि आंखें बंद कर लेने से हालात नहीं बदल जाते। यह मानना कि मेरे अलावा कोई कुछ नहीं जानता, अभिमान और अज्ञान का प्रतीक है।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि अपने अंतर चक्षु खोलकर देखने पर पता चलेगा कि हम क्या सही और क्या गलत कर रहे हैं। जब तक मन की आंखें नहीं खुलेंगी, तब तक अपनी गलतियों का अहसास नहीं होगा। व्यक्ति अपने कर्मों का फल भुगत रहा है, फिर भी दुर्भाग्य से उसके अंदर की आंखें नहीं खुल पा रही हैं। उन्होंने कहा कि हम जैसा बोलेंगे, वैसा ही सुनना भी पड़ेगा। सम्माननीय लोग मर्यादा और शिष्टता तोड़ेंगे तो दूसरे क्या सीखेंगे। माता-पिता या गुरु की भाषा गलत होगी तो बच्चे क्या सीखेंगे।
जीव दया का संदेश देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि पशु-पक्षियों को मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जो इन्हें मारेंगे, उन्हें परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। पापी पेट के लिए कभी जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए।
सत्संग के दौरान आचार्य श्रीरामदयाल महाराज ने आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान के भीलवाड़ा चैप्टर द्वारा नेत्रदान जागरूकता अभियान के तहत मनाए जा रहे नेत्रदान पखवाड़े के पोस्टर-बैनर का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि नेत्रदान किसी एक पखवाड़े तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि हमेशा किया जाना चाहिए।
रामस्नेही चिकित्सालय के रतन दरगड़ ने चिकित्सालय में उपलब्ध नेत्र संबंधी सुविधाओं की जानकारी दी। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिष्ठा ने नेत्रदान कौन कर सकता है और इसका क्या महत्व है, इस संबंध में जानकारी दी। प्रवचन के बाद कई श्रद्धालुओं ने नेत्रदान संकल्प पत्र भरे।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
चातुर्मास के दौरान दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। इससे पहले सुबह 8.30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।