तस्वीर में माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित सत्संग के दौरान मंच पर विराजमान आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज और अन्य संतगण नजर आ रहे हैं।

भीलवाड़ा, 7 अगस्त। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि संसार का स्नेह और प्रेम व्यक्ति को कमजोर करता है, जबकि सद्गुरू का प्रेम व स्नेह इंसान को मजबूती प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि संसार का बंधन इंसान को कमजोर बनाता है, जबकि सद्गुरू का बंधन उसे मजबूती देता है। इसी कारण राम गुरू के बंधन में बंधकर ज्ञानी चौरासी के बंधन से मुक्त होने का दावा करते हैं।

आचार्यश्री शुक्रवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कई जन्मों का पुण्योदय होता है जब भारत की धरती पर जन्म होता है। अनंत जन्मों का भाग्योदय होने पर रामस्नेही सम्प्रदाय की कल्पतरू छत्रछाया मिलती है और जब सौभाग्योदय होता है तब सद्गुरू की कृपा एवं भजन करने का अवसर प्राप्त होता है। सद्गुरू की कृपा से ही जीवन धन्य होता है।



 आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि कई लोग सम्मानित व्यक्ति, ज्ञानीजन और गुरू, जिनकी कृपा से जीवन व ज्ञान मिला, उनके समक्ष भी मिथ्या ज्ञान का बखान करते हैं और वाद-विवाद खड़ा करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के कृत्यों के भयंकर परिणामों के बारे में शास्त्रों में भी आगाह किया गया है। शास्त्र के किसी भी कथन को सत्य कहने का सामर्थ्य नहीं है तो उसे असत्य कहने का भी कोई अधिकार नहीं है। वेदों, शास्त्रों, पुराणों और अनुभव वाणी में जो भी लिखा है, वह अक्षरशः सही है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानी जब अज्ञान की बात करता है तो वह भी अज्ञानी हो जाता है। गुरू, वेद, धर्म और संस्कृति का सम्मान होना चाहिए। घर, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में विवाद, विरोध एवं विद्रोह के तीन प्रमुख कारण अज्ञानवाद, अर्थवाद और अहंकारवाद होते हैं। विवाद का सबसे बड़ा कारण अज्ञान होता है।

आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यवहार हमें अपने लिए पसंद नहीं है, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए, लेकिन अज्ञान इसे स्वीकार नहीं करता। व्यक्ति अपने लिए अच्छा व्यवहार चाहता है, पर दूसरे के साथ दुर्व्यवहार करता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने अज्ञान से जितना मानसिक संताप एवं दुःख प्राप्त करता है, उतना किसी अन्य कर्म से नहीं होता। दुनिया में तन के दुःखी कम और मन के दुःखी असंख्य हैं।

भीलवाड़ा की पावन धरा को नमन करते हुए आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि इसी धरती पर स्वामी रामचरण महाराज ने प्रकट होकर अलौकिक भक्ति की और विक्रम संवत 1817 में भीलवाड़ा की धरती पर अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना कर अनुभव वाणी जैसे महान ग्रंथ का सृजन किया। उन्होंने कहा कि भीलवाड़ा अनुभव वाणी की प्राकट्य भूमि है, जिसमें संतों की अनुभूति एवं अनुभव समाहित हैं।

आचार्यश्री से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। कोटा से आए संत प्रीतमरामजी ने भजन की प्रस्तुति दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई।

सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास के दौरान दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

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