भीलवाड़ा में आयोजित चातुर्मास के दौरान प्रवचन देते हुए आचार्य पुलकसागरजी महाराज।

राम की पूजा करना आसान है, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम जैसा बनना बेहद कठिन है। जीवन में जब पाप कर्मों का उदय होता है और व्यक्ति को पीड़ा व वेदना सहनी पड़ती है, तब उसे राम के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। जिनका सब कुछ मात्र दस मिनट में छिन गया, वे भी विचलित नहीं हुए। छोटी-छोटी बातों पर विवाद करने वाले लोगों को राम के जीवन और उनकी मानसिक स्थिति से सीख लेनी चाहिए। यह विचार राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने बुधवार को भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में व्यक्त किए।

श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित चातुर्मास के दौरान आचार्य पुलकसागरजी महाराज की अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ की मंगल दिव्य देशना प्रारंभ हुई। भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे आचार्यश्री ने प्रवचन के प्रथम दिन जीवन में सही मानसिकता, कर्मों के प्रभाव और दुःख सहने की क्षमता के महत्व पर प्रकाश डाला।


आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति की मानसिकता ही उसके सुख और दुःख का कारण बनती है। राम का सब कुछ छिन गया, लेकिन उनकी मानसिकता नहीं छिनी, इसलिए वे विचलित नहीं हुए। सही मानसिकता सम्यक दर्शन और गलत सोच मिथ्या दर्शन कहलाती है। संचित कर्म नहीं, बल्कि जो कर्म उदय में आते हैं, वे दुःख का कारण बनते हैं। दुःख के समय ही असली धर्म की पहचान होती है। राम ने हर परिस्थिति में जीना सीखा और उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। ऐसी सोच रखने वाला व्यक्ति ही सम्यक दृष्टि होता है।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति की पूजा उसके शरीर के कारण नहीं, बल्कि उसकी मानसिकता के कारण होती है। मानसिकता ही दुःख का कारण भी बनती है। किसी को अपने दुःख का भागीदार बनाने के बजाय उसे स्वयं सहन करना चाहिए, क्योंकि कितने भी लोगों को दुःख में भागीदार बना लिया जाए, कर्मों का फल स्वयं ही भोगना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अपनी दृष्टि बदलना जरूरी है। धर्म करने वाला व्यक्ति सम्यक दृष्टि वाला हो, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन जो सम्यक दृष्टि वाला होगा, वह धर्म अवश्य करेगा। संसार में हमारे साथ जो भी अच्छा या बुरा होता है, उसके लिए कोई दूसरा नहीं, बल्कि हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं।

कर्मों के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि हमारे कर्म ही हमारी परिस्थितियों का कारण होते हैं। संचित कर्मों का प्रभाव तब तक नहीं होता, लेकिन जब वे संचित अवस्था से प्रारब्ध में आते हैं, तब जीवन में सुख या दुःख के रूप में अपना असर दिखाते हैं। संसार में कर्म के बिना कुछ नहीं होता और अशुभ कर्म कभी सुख के रूप में नहीं आते। सम्यक दृष्टि होने पर व्यक्ति में दुःख सहने की शक्ति विकसित होती है और पाप भी उसे डरा नहीं पाता। तीर्थंकरों के जीवन में भी पाप कर्मों का उदय होता है, लेकिन वे उसे महसूस नहीं करते। उन्होंने कहा कि जो कष्टों को सहन नहीं कर पाता, वह मिथ्या दृष्टि होता है।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि प्रवचन प्रारंभ होने से पहले पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य सुनील सुनीता सेठी परिवार को प्राप्त हुआ। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 30 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारबिंद से दिव्य देशना होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6.30 से 7.30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

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