भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में राष्ट्र संत पुलकसागरजी महाराज के सानिध्य में आयोजित सौभाग्य संवर्धक महोत्सव की पूर्णाहुति पर हवन कुंडों के समक्ष धार्मिक अनुष्ठान करते श्रावक-श्राविकाएं।

भीलवाड़ा में विजयादशमी के अवसर पर मंगलवार, 20 अक्टूबर को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित सौभाग्य संवर्धक महोत्सव का विधि-विधान के साथ समापन हुआ। शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में नवरात्रि के दौरान आयोजित भगवान पार्श्वनाथ विधान एवं नवग्रह जाप अनुष्ठान की पूर्णाहुति की गई। इस अवसर पर सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्यश्री के सानिध्य में अणुव्रत संस्कार ग्रहण कर आत्मकल्याण के संकल्प लिए।

आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में बुधवार से 30 अक्टूबर तक सूर्यमहल में जीवन जीने की कला विषय पर मंगल दिव्य देशना का आयोजन होगा। इस अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारबिंद से दिव्य देशना प्राप्त होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6.30 से 7.30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जाएगा।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि सौभाग्य संवर्धक महोत्सव के अंतर्गत भगवान पार्श्वनाथ विधान एवं नवग्रह जाप अनुष्ठान की पूर्णाहुति में ऐसे कई श्रावक-श्राविकाएं भी शामिल हुए, जो किसी कारणवश अब तक अनुष्ठान में भाग नहीं ले पाए थे। अनुष्ठान में शामिल सभी लोगों को उनके भाग्यांक एवं ग्रह के अनुसार वस्त्र प्रदान किए गए। महोत्सव के समापन पर भाग्यांक एक से नौ नंबर तक के उन पुण्यार्जकों का सामूहिक निष्ठापन अनुष्ठान हुआ, जिन्होंने नवग्रह अनुष्ठान में भाग लिया था।

पूर्णाहुति के लिए करीब 100 हवन कुंड बनाए गए थे। इनमें मंत्रोच्चार के बीच नवग्रह की आहुतियां दी गईं। आचार्यश्री ने अनुष्ठान में शामिल सभी श्रावक-श्राविकाओं के लिए मंगलकामनाएं कीं। अनुष्ठान करने वाले श्रद्धालुओं को अभिमंत्रित माला भी प्रदान की गई।

नवग्रह जाप अनुष्ठान संपन्न होने के बाद आचार्यश्री के सानिध्य में अणुव्रत संस्कार महोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें श्रावक-श्राविकाओं ने स्वेच्छा से आत्मकल्याण की भावना के साथ अष्ट मूल गुण धारण किए। अणुव्रती बनने के लिए लिए गए संकल्पों में जिनेन्द्र भगवान के अलावा किसी अन्य को अपने भगवान स्वरूप में नहीं मानना, दिगम्बर जैन आचार्य, उपाध्याय एवं साधु के अलावा किसी अन्य को धार्मिक गुरु नहीं मानना तथा जिनवाणी के अलावा किसी पर श्रद्धा नहीं रखना शामिल है।

इसके अलावा आजीवन शराब, शहद, मांस, सिगरेट, गुटखा, तंबाकू जैसे किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करने, बड़पीपल, अंजीर एवं अन्य हिंसक फलों का सेवन नहीं करने, शहर में रहने पर प्रतिदिन देवदर्शन करने और सुविधानुसार अभिषेक-पूजन करने के संकल्प भी दिलाए गए। श्रावक-श्राविकाओं ने मांसाहारी होटलों में अन्न-जल ग्रहण नहीं करने और दूसरे धर्म में विवाह नहीं करने का संकल्प लिया। साथ ही बुरे से बुरे दिन आने पर भी आत्महत्या नहीं करने, किसी की हत्या नहीं करने तथा अपने जीवन में धर्म, गुरु और शास्त्र की निंदा नहीं करने एवं ऐसी निंदा नहीं सुनने के संकल्प भी शामिल रहे।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि जिन्होंने शुद्ध भावों से ये संकल्प लिए हैं, वे कभी नरक और पशु गति में नहीं जाएंगे तथा उनका कल्याण निश्चित है। उन्होंने कहा कि अणुव्रती बनने वाले ही सच्चे और पक्के जैन होते हैं। अणुव्रत संस्कार महोत्सव के दौरान लिए गए संकल्पों को प्रतिज्ञा पत्र के रूप में सभी श्रावक-श्राविकाओं को प्रदान किया गया, ताकि वे अपने संकल्पों का स्मरण रख सकें और उनका निरंतर पालन करते रहें।

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