भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ के दौरान श्रद्धालुओं को दिव्य देशना देते जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज।

भीलवाड़ा में चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत आचार्य पुलकसागर महाराज ने क्रोध और कषायों से मुक्ति पाने के लिए क्षमा को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गुस्सा हमें कोई दूसरा नहीं दिलाता, बल्कि हम स्वयं क्रोध करते हैं और इसका कारण दूसरों को मान लेते हैं। मन में जमा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को दूर करने के लिए आत्मशुद्धि जरूरी है। क्षमा मांगने से शत्रु भी मित्र बन सकते हैं।

श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगंबर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शुक्रवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ के तीसरे दिन मंगल दिव्य देशना दी। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं को शुद्ध नहीं करेगा, तब तक भगवान की पूजा करने से भी मोक्ष नहीं मिल सकता।

आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति को अपना आभामंडल इतना मजबूत बनाना चाहिए कि उसके सामने कोई क्रोध न कर सके। किसी उदाहरण को कभी परंपरा नहीं बनाना चाहिए। किसी के साथ विवाद होने पर सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग अपनी गलती स्वीकार नहीं करते, जबकि भीतर से यह भावना होनी चाहिए कि परमात्मा हमें क्षमा करें।

उन्होंने कहा कि लोग मुक्ति की कामना तो करते हैं, लेकिन दिनभर कषाय बंध के कार्य करते रहते हैं। व्यक्ति परिवार के सदस्यों के प्रति तो कषाय करता ही है, कभी-कभी अजीव वस्तुओं पर भी गुस्सा निकालता है। आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति यह दावा करता है कि वह कषाय नहीं करता, उसे केवलज्ञान हो जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी लोग कषाय करते हैं, लेकिन साधना के माध्यम से पुरुषार्थ करके उनसे बचने का लक्ष्य रखना चाहिए। कषायों से बचने के लिए क्षमा मांगना सीखना जरूरी है।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि क्षमा मांगने के लिए पर्युषण के बाद क्षमावाणी पर्व आने का इंतजार नहीं करना चाहिए। जिस पल गलती हो, उसी समय क्षमा मांग लेनी चाहिए। बार-बार क्षमा मांगने से क्रोध की ताकत कमजोर होती है। यदि व्यक्ति सभी से क्षमा मांगना सीख ले, तो कषाय की लकीरें बढ़ना भी बंद हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने वाला कभी कमजोर नहीं होता, बल्कि यह उसकी महानता की निशानी है। क्षमा के गुण को अपनाकर ही कषायों से मुक्ति की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि प्रवचन के प्रारंभ में पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट का सौभाग्य श्रीमती रसालीदेवी, जिनेन्द्र, शैलेन्द्र और मृदुल पाटनी परिवार को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।

चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह और सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 30 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारबिंद से दिव्य देशना होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6.30 से 7.30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जा रहा है। इसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं। आचार्यश्री की देशना में क्षमा, आत्मशुद्धि और कषायों से मुक्ति को जीवन में अपनाने पर जोर दिया गया।

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