क्या है असम में लागू होने वाला UCC Bill? जानें इसके मुख्य प्रावधान और नागरिकों को होने वाले फायदे
उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम विधानसभा में पेश हुआ समान नागरिक संहिता विधेयक। जानें UCC Bill की पूरी जानकारी विस्तार से देनेवाली यह रिपोर्ट।

भारतीय तिरंगे की पृष्ठभूमि पर 'यूसीसी बिल' के मुख्य प्रावधानों, इतिहास और आम नागरिकों पर इसके कानूनी प्रभाव को समझाता एक विशेष ग्राफिक्स इंफोग्राफिक।
Uniform Civil Code India 2026 : स्वतंत्र भारत के इतिहास में 'समान नागरिक संहिता' (UCC) हमेशा से ही सबसे संवेदनशील, वैचारिक रूप से विभाजित और राजनीतिक रूप से जीवंत बहसों में से एक रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में शामिल यह संकल्पना अब केवल कागजी विमर्श या चुनावी घोषणापत्रों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इक्कीसवीं सदी के भारत में यह धरातल पर उतरने लगी है। देश में धर्म, जाति और क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर सदियों से चले आ रहे पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानूनों) के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए एक समान पारिवारिक कानून बनाने की मुहिम ने अब भारी रफ्तार पकड़ ली है। उत्तराखंड के बाद अब गुजरात और असम जैसे राज्यों के बड़े नीतिगत फैसलों ने इस राष्ट्रीय विमर्श को एक नई और निर्णायक दिशा दे दी है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत में व्यक्तिगत कानूनों की नींव ब्रिटिश राज के दौरान पड़ी थी, जब 1840 की लेक्स लोकी रिपोर्ट के बाद अंग्रेजों ने रणनीतिक रूप से हिंदू और मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने से अलग रखा था। स्वतंत्रता के बाद, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के कड़े प्रयासों से 'हिंदू संहिता विधेयक' तो पारित हुआ, जिसने हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के कानूनों को काफी हद तक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाया, लेकिन अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को इससे छूट दे दी गई। इसके बाद 1985 के ऐतिहासिक शाह बानो मामले ने देश के सियासी और न्यायिक ढांचे को हिलाकर रख दिया, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर कड़ा बल दिया। दशकों तक चली इस वैचारिक जंग के बाद, वर्तमान भाजपा नीत सरकारों ने इसे राज्य स्तर पर लागू करने की आक्रामक रणनीति अपनाई है।
इस कानूनी सुधार के मोर्चे पर देवभूमि उत्तराखंड ने इतिहास रचते हुए सबसे पहली बाजी मारी। उत्तराखंड विधानसभा द्वारा पारित समान नागरिक संहिता विधेयक को आधिकारिक तौर पर 2 जनवरी 2025 को पूरे राज्य में लागू कर दिया गया, जिससे उत्तराखंड आजादी के बाद देश में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना (गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से ही नागरिक संहिता लागू थी)। उत्तराखंड के इस कदम के बाद सुधारों का यह कारवां पश्चिमी भारत की ओर बढ़ा, जहां गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में अपना समान नागरिक संहिता विधेयक भारी बहुमत से पारित कर इतिहास दोहराया। इसी कड़ी में एक और बड़ा कदम उठाते हुए असम सरकार ने मई 2026 में राज्य विधानसभा के भीतर आधिकारिक तौर पर यूसीसी विधेयक पेश कर दिया है, जिसके पारित होते ही असम यह कानून लाने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र सहित कई अन्य भाजपा शासित राज्यों ने भी इसी तर्ज पर जल्द कानून लाने की प्रतिबद्धता जताई है।
विभिन्न राज्यों द्वारा तैयार किए जा रहे इन यूसीसी विधेयकों की कानूनी और सामाजिक रूपरेखा बेहद आधुनिक और व्यापक है। इन कानूनों का मुख्य ध्यान सदियों पुराने पितृसत्तात्मक नियमों को बदलकर पूर्ण लैंगिक समानता स्थापित करने पर है। नए प्रावधानों के तहत अब सभी धार्मिक समुदायों की महिलाओं को पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार और मालिकाना हक में पुरुषों के बिल्कुल समान अधिकार की गारंटी दी गई है। इसके अलावा, सभी धर्मों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु तय करने, बहुविवाह (पॉलीगामी) जैसी प्रथाओं को पूरी तरह प्रतिबंधित करने और तलाक व भरण-पोषण (पोटगी) की प्रक्रियाओं को पूरी तरह से मानकीकृत और धर्म-तटस्थ बनाने के प्रावधान शामिल हैं। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विवाह, तलाक और यहाँ तक कि 'लिव-इन रिलेशनशिप' की आधिकारिक सरकारी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) को अनिवार्य बनाया गया है, जिसके उल्लंघन पर दंड या कारावास की कड़ी कानूनी व्यवस्था है।
हालांकि, इस ऐतिहासिक कानून के कार्यान्वयन को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों से गंभीर आपत्तियां और तीखे विरोध भी सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कुछ क्षेत्रीय सहयोगियों, विपक्षी दलों और विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के नागरिक संगठनों का दावा है कि यह कानून भारत की मूल बहुलतावादी संस्कृति और "भारत के विचार" के खिलाफ जाता है। नागालैंड और मेघालय जैसे राज्यों के जनजातीय समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी है कि यह उनके स्थानीय रीति-रिवाजों और स्वायत्तता को नष्ट कर देगा। इस संवेदनशीलता और विरोध को देखते हुए ही, राज्यों ने सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण के लिए अपने कानूनों में अनुसूचित जनजातियों (ST) और विशिष्ट स्थानीय आदिवासी चालीरीतों को इस संहिता के कानूनी दायरे से पूर्णतः बाहर रखा है। देश के सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न विधि आयोगों के परामर्शों के बीच, राज्य स्तर पर यूसीसी का यह क्रमिक विस्तार आने वाले समय में भारतीय न्यायशास्त्र, सामाजिक ताने-बाने और राजनीति की दशा और दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
