भगवान हमें सदैव देखते हैं, इसलिए रखें आचरण निर्मल” — आचार्य प्रज्ञासागर महाराज पंचमकाल में धर्म, शास्त्र और गुरु-भक्ति को जीवन का आधार बनाने का आह्वान
कोटा स्थित श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री 108 प्रज्ञासागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि “भगवान को भले हम न देखें, पर वे सदैव हमें देखते हैं।” पंचमकाल में धर्म, शास्त्र और गुरु-भक्ति को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया गया।

कोटा। आरके पुरम स्थित श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर (त्रिकाल चौबीसी) में रविवार को तपोभूमि प्रणेता एवं व्याख्यान वाचस्पति आचार्य श्री 108 प्रज्ञासागर जी महामुनिराज के प्रेरक प्रवचन ने श्रद्धालुओं के हृदय को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि “भले हम भगवान को न देख पाएं, परंतु भगवान की दृष्टि सदैव हम पर रहती है। अतः हमारा आचरण निर्मल और विचार पवित्र होने चाहिए।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचमकाल में मोक्षमार्ग की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है, परंतु यदि किसी को यह अवसर प्राप्त होता है तो वह गुरु का परम उपकार होता है। आचार्यश्री ने कहा कि इस युग में धर्म-साधना, शास्त्राध्ययन और गुरु-भक्ति का भाव ही जीवन को सार्थक बनाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “सुबह मंदिर जाने वाला व्यक्ति आत्मा की ओर अग्रसर होता है, जबकि मंडी जाने वाला व्यक्ति माया के जाल में उलझ जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम एक बार मंदिर अवश्य जाना चाहिए और आत्मकल्याण के लिए समय निकालना चाहिए।”
प्रज्ञासागर महाराज ने कहा कि भगवान के चरणों में जो भी द्रव्य—चावल, नारियल आदि—चढ़ाया जाता है, वह भगवान का हो जाता है। “जैसे जन्म के समय हमें भगवान को समर्पित किया गया था, वैसे ही हम सभी भगवान के भक्त हैं, और भगवान का हम पर अधिकार है,” उन्होंने कहा।
आचार्यश्री ने आधुनिक उदाहरण देते हुए बताया कि आज हर जगह लिखा होता है — “आप कैमरे की नज़र में हैं।” तब लोग अपने व्यवहार को नियंत्रित कर लेते हैं। उसी प्रकार यह भावना रखनी चाहिए कि भगवान की दृष्टि भी सदैव हम पर है। “यदि हम असत्य, हिंसा, लोभ, ईर्ष्या या परिग्रह में लिप्त होंगे, तो ईश्वर की दृष्टि से बच नहीं सकेंगे। अतः जीवन में संयम, सत्य और पवित्रता को अपनाना ही सच्ची साधना है,” उन्होंने कहा।
धर्मसभा में गुरूआस्था परिवार के अध्यक्ष लोकेश जैन, महामंत्री नवीन जैन दौराया, जगदीश जिंदल, विनोद टोरडी, जे.के. जैन, मनोज जैसवाल, अनिल ठोरा, अकिंत जैन, अर्पित सर्राफ, पारस लुंग्या, कपिल आगम, मुकेश कोटिया, ओमप्रकाश जैन, अनुराग टोंग्या और निर्मल सेठी सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंदिर परिसर में पूरे दिन भक्ति, श्रद्धा और अध्यात्म का वातावरण गूंजता रहा।
प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि पंचमकाल के इस युग में धर्म, शास्त्र और गुरु-भक्ति को जीवन का आधार बनाकर ही मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य पूर्ण किया जा सकता है।
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Pratahkal Bureau
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