देव दीपवाली, जिसे "देवों का दीपावली" भी कहा जाता है, कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। वर्ष 2025 में यह पर्व 5 नवंबर को पड़ रहा है। यह त्योहार उत्तर भारत के वाराणसी (बनारस), उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन राज्यों में श्रद्धालु दीप जलाकर, भजन‑कीर्तन, आरती और सामूहिक पूजा द्वारा इस दिन की धार्मिक महत्ता को व्यक्त करते हैं। बनारस के घाटों पर दीपों की रोशनी में गंगा का प्रतिबिंब और उत्तराखंड के काशी और ऋषिकेश के घाटों पर दीपदान का दृश्य इस पर्व की खास पहचान बनता है।

मुंबई में देव दीपावली की प्रामाणिकता और पारंपरिक उत्सव का केंद्र बाणगंगा टैंक, वालकेश्वर है। इसे शहर का "मिनी बनारस" कहा जाता है। यह स्थल 12वीं सदी में स्थापित हुआ था और हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान राम द्वारा तीर चलाकर उत्पन्न जल स्रोत के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ कार्तिक पूर्णिमा की रात को टैंक की सीढ़ियों, आसपास के परिसर और जल में हजारों दीप जलाए जाते हैं। भक्त भजन‑कीर्तन और आरती में भाग लेते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, प्रकाश और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।

बाणगंगा टैंक पर देव दीपावली का उत्सव GSB टेम्पल ट्रस्ट और महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम (MTDC) के सहयोग से आयोजित किया जाता है। यह कार्यक्रम सूर्यास्त के बाद प्रारंभ होकर देर रात तक चलता है। शाम के समय ढोल‑ताशा और भजन‑कीर्तन की ध्वनि माहौल को अत्यंत भक्तिपूर्ण बना देती है। इसके बाद दीपदान किया जाता है, जिसमें भक्त जल में दीप तैराकर आस्था व्यक्त करते हैं। जल में दीपों का प्रतिबिंब और सीढ़ियों पर जगमगाती रोशनी एक मनोहारी और भव्य दृश्य प्रस्तुत करती है। यह आयोजन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाणगंगा टैंक का ऐतिहासिक महत्व और रामायण कथाओं से जुड़ाव इसे धार्मिक दृष्टि से विशेष बनाता है। यहां दीपदान केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। मुंबई में यह पर्व स्थानीय लोगों के लिए सामूहिक आस्था और सामाजिक सहभागिता का अवसर भी प्रदान करता है। परिवार और समाज के सदस्य एक साथ दीप जलाकर और भजन‑कीर्तन में भाग लेकर अपनी आस्था और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं।


पर्यावरण और सुरक्षा के दृष्टिकोण से, आयोजकों और भक्तों को सावधानी बरतनी पड़ती है। दीपदान में केवल तेल‑दीये या प्राकृतिक सामग्री के बने दीपों का उपयोग करना चाहिए। जल प्रदूषण और अवशेषों के प्रबंधन का ध्यान रखा जाता है ताकि टैंक और आसपास का पर्यावरण सुरक्षित रहे। सार्वजनिक परिवहन से पहुंचने और शाम जल्दी आने की सलाह दी जाती है, क्योंकि आयोजन स्थल पर भीड़ और ट्रैफिक अधिक होता है। मुंबई में बाणगंगा टैंक पर देव दीपावली का अनुभव आधुनिक जीवन की भाग‑दौड़ के बीच एक ऐसा अवसर प्रदान करता है, जहां श्रद्धा, रोशनी और इतिहास एक साथ मिलते हैं। यह पर्व न केवल दीपों का उत्सव है, बल्कि भक्तों के लिए आत्मा को शांति देने वाला और सामूहिक विश्वास को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव भी है। यदि आप इस साल इस आयोजन में शामिल होते हैं, तो दीपों से जगमगाते बैंगंगा टैंक की रात आपके लिए अविस्मरणीय अनुभव साबित होगी।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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