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हाईकोर्ट अल्टीमेटम; जब्त गाड़ियों का त्वरित निपटान जरूरी
By EditorialPublished on
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि जब्त या छोड़े गए वाहनों को केवल डंपिंग यार्ड में फेंक देना समाधान नहीं है। यदि वे वाहन उपयोग योग्य नहीं हैं और उनकी आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें निष्पादित (Dispose) करने के लिए एक निरंतर और व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए...

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मुंबई उच्च न्यायालय ने महानगर की सड़कों पर लावारिस या पुलिस द्वारा जब्त किए गए वाहनों की बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इस दिशा में त्वरित और ठोस कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुंबई जैसी जनसंख्या और यातायात से जूझती हुई महानगरी की सड़कें अब लावारिस वाहनों का “कब्रिस्तान” नहीं बन सकतीं।
यह सख्त टिप्पणी एक हाउसिंग सोसाइटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें सोसायटी के गेट के बाहर स्थानीय पुलिस स्टेशन द्वारा जब्त किए गए वाहनों के डंप होने से उत्पन्न हो रही असुविधा और अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया था।
वाहनों को सिर्फ डंप करना काफी नहीं: हाईकोर्ट
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि जब्त या छोड़े गए वाहनों को केवल डंपिंग यार्ड में फेंक देना समाधान नहीं है। यदि वे वाहन उपयोग योग्य नहीं हैं और उनकी आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें निष्पादित (Dispose) करने के लिए एक निरंतर और व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में जब शहर में सार्वजनिक स्थानों की भारी कमी है, फुटपाथ और सड़कें पहले से ही ट्रैफिक और अतिक्रमण से प्रभावित हैं, तो ऐसे में जब्त वाहनों को खुले स्थानों पर छोड़ देना किसी भी दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं है।
अदालत ने राज्य सरकार को दिए निर्देश :
अदालत ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि वह मुंबई महानगरपालिका के प्रत्येक वार्ड में ऐसे वाहनों को रखने के लिए उपयुक्त और सुविधाजनक स्थानों की पहचान करे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया को केवल वाहनों के अस्थायी भंडारण तक सीमित न रखा जाए, बल्कि समयबद्ध तरीके से उनका निपटान किया जाए।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने यातायात विभाग को यह निर्देश दिया कि वह याचिका में उठाए गए मुद्दों का दीर्घकालिक समाधान सुझाए और इस संदर्भ में अब तक उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी अगली सुनवाई में प्रस्तुत करे।
पुलिस विभाग का पक्ष और हलफनामा :
यातायात विभाग के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त ने अदालत को जानकारी दी कि एक माह पूर्व शहर के सभी पुलिस थानों को एक सर्कुलर भेजा गया था। इसमें यह सलाह दी गई थी कि जब्त किए गए सभी वाहनों को निकटतम डंपिंग यार्ड में स्थानांतरित किया जाए ताकि सार्वजनिक स्थानों पर अनावश्यक अव्यवस्था न फैले।
हालांकि अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है। जब तक उन वाहनों के निपटान की प्रभावी प्रणाली नहीं बनाई जाती, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
हाउसिंग सोसायटी की शिकायत बनी कार्रवाई का आधार :
यह मामला उस वक्त उठा जब मुंबई की एक हाउसिंग सोसायटी ने उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि नजदीकी पुलिस स्टेशन द्वारा उनके गेट के बाहर जब्त वाहन खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे आवाजाही में बाधा उत्पन्न होती है।
याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि लंबे समय तक वाहन वहीं खड़े रहते हैं, जो ना केवल अतिक्रमण को जन्म देते हैं, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी चिंताजनक हैं।
अगली सुनवाई 2 जुलाई को :
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 जुलाई 2025 की तारीख निर्धारित की है। साथ ही यातायात विभाग को निर्देश दिया है कि वह तब तक इस मुद्दे के स्थायी समाधान के लिए उठाए जाने वाले ठोस कदमों की विस्तृत जानकारी कोर्ट में पेश करे।
हाईकोर्ट की चेतावनी, कार्रवाई अनिवार्य :
मुंबई जैसे बड़े शहरों में सार्वजनिक स्थानों की बढ़ती मांग और संसाधनों की कमी को देखते हुए उच्च न्यायालय की यह पहल सराहनीय है। अदालत का यह कहना कि “मुंबई की सड़कें अब लावारिस वाहनों का कब्रिस्तान नहीं बन सकतीं,” न केवल एक कानूनी चेतावनी है बल्कि एक सामाजिक और प्रशासनिक संदेश भी है।
यह मामला एक उदाहरण बनकर सामने आया है कि किस प्रकार नागरिकों की छोटी-सी समस्या भी प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में कदम बन सकती है, बशर्ते न्यायपालिका उसका संज्ञान ले।

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