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RLD ने लिया फैसला; जातीय जनगणना पर दिया बड़ा बयान
By EditorialPublished on
केंद्र सरकार द्वारा जातीय जनगणना कराने के फैसले के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बीच राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी महासचिव ने साफ किया है कि रालोद इस फैसले का स्वागत करती है और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानती है। जयंत चौधरी की पार्टी ने कहा है कि जातीय आंकड़े सामने आने से नीतियां ज्यादा पारदर्शी और समावेशी बन सकेंगी।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को दिल्ली में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए। सबसे बड़ा निर्णय था जातीय जनगणना कराने का, जिसे लेकर दशकों से राजनीति होती रही है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बैठक के बाद जानकारी दी कि यह जनगणना अब मुख्य जनगणना प्रक्रिया के साथ ही कराई जाएगी।
इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। जयंत चौधरी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने इस फैसले का जोरदार समर्थन करते हुए इसे “राष्ट्रहित में लिया गया ऐतिहासिक कदम” बताया है। पार्टी महासचिव त्रिलोक त्यागी ने कहा कि यह निर्णय पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सपनों को साकार करने की दिशा में बड़ी पहल है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरी कैबिनेट का आभार जताते हुए कहा, “अब हर वर्ग को मिलेगा हक और सम्मान।” त्यागी ने इसे जातीय समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में निर्णायक मोड़ बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कदम से सभी जातियों और धर्मों का सम्मान बढ़ेगा और देश में तरक्की व खुशहाली आएगी।
कांग्रेस पर निशाना :
वहीं, अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद कांग्रेस ने कभी जातीय जनगणना को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने बताया कि 1947 के बाद से जातीय जनगणना नहीं हुई, और कांग्रेस ने केवल राजनीतिक लाभ के लिए जाति आधारित सर्वे कराए। उन्होंने यह भी बताया कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में जातीय जनगणना का वादा किया था, लेकिन कैबिनेट की संस्तुति के बावजूद इसे केवल सीमित सर्वे के रूप में छोड़ दिया गया। वैष्णव ने स्पष्ट किया कि जनगणना संविधान की केंद्रीय सूची के अंतर्गत आता है और इस पर निर्णय लेने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ राज्यों में जाति सर्वे राजनीतिक उद्देश्य से और अपारदर्शी तरीके से किए गए हैं।
क्या बदल सकता है यह फैसला ?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, केंद्र सरकार का यह फैसला सिर्फ सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों में भी बड़ा बदलाव ला सकता है। विपक्ष लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग कर रहा था, लेकिन अब सरकार ने यह मुद्दा विपक्ष के हाथ से छीन लिया है। यह कदम 2024 के बाद की राजनीति में सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। जातीय जनगणना से नीतियों को बेहतर लक्ष्य और योजना के अनुसार तैयार किया जा सकेगा, जिससे वंचित वर्गों को सीधे लाभ मिलेगा।

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