खेरोदा में अनूठी परंपरा: खेड़ाखूंट माताजी की पूजा के बाद ही मनाई जाती है दीपावली
खेरोदा कस्बे में प्राचीन परंपरा के अनुसार खेड़ाखूंट माताजी की पूजा और हर घर से दीपक जलाने के बाद ही ग्रामीणों ने घरों में दीपोत्सव की शुरुआत की।
दीपावली के अवसर पर खेरोदा स्थित मंदिर में फूलों की मालाओं से सजी खेड़ाखूंट माताजी की प्रतिमा दिख रही है।
खेरोदा कस्बे में दीपावली का पर्व सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और सामूहिक आस्था के साथ मनाया जाता है। यहां दीपोत्सव की शुरुआत खेड़ाखूंट माताजी की पूजा-अर्चना से होती है। माता के मंदिर में पूजन के बाद ही कस्बेवासी अपने घरों और प्रतिष्ठानों में दीपावली की पूजा करते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
खेरोदा स्थित खेड़ाखूंट माताजी मंदिर में हर वर्ष की तरह इस बार भी दीपावली का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। दीपावली के अवसर पर मंदिर प्रांगण में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है, जो पूरे वर्ष लगातार जलती रहती है। कस्बे की धार्मिक परंपरा के अनुसार, माता की पूजा-अर्चना के बाद ही दीपोत्सव मनाने की शुरुआत होती है। इसके तहत प्रत्येक घर से एक दीपक लाकर माताजी के मंदिर प्रांगण में जलाया जाता है।
कस्बे के बुजुर्गों और पंडितों के अनुसार, खेरोदा प्राचीन समय में 'खेड़ा देवरा' के नाम से विख्यात था। इसी ऐतिहासिक पहचान से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का निर्वहन आज भी कस्बेवासी पूरी निष्ठा से कर रहे हैं।
दीपावली की तैयारियों के तहत होली चौक, गांधी चौक और माताजी मंदिर प्रांगण को धनतेरस से लेकर दीपावली तक सतरंगी रोशनी से भव्य रूप से सजाया जाता है। इस दौरान पूरे क्षेत्र में दीपोत्सव का विशेष माहौल रहता है।
दीपावली के अवसर पर कस्बे के पंचों और ग्रामवासियों द्वारा एक साथ समूह में धनलक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना भी की जाती है। सामूहिक रूप से होने वाला यह पूजन खेरोदा की वर्षों पुरानी परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आपसी एकता का अनूठा प्रतीक है। खेड़ाखूंट माताजी की आराधना से दीपावली मनाने की यह परंपरा आज भी कस्बे की धार्मिक और सामाजिक पहचान को बनाए हुए है।