ड्राइवर और नौकर के नाम खरीदी संपत्ति अब होगी जब्त: सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने छीन ली काला धन छिपाने वालों की नींद!
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 2016 से पहले किए गए बेनामी लेन-देन में भी सरकार संपत्तियां जब्त कर सकती है, वसीयत के खेल पर भी लगी रोक।
बेनामी संपत्ति और लेन-देन पर कानूनी कार्रवाई को दर्शाती एक सांकेतिक तस्वीर।
भारत में काले धन के विरुद्ध जारी लंबी कानूनी लड़ाई में उच्चतम न्यायालय ने एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित कर दिया है, जो दशकों से बेनामी संपत्तियों के माध्यम से कर चोरी और अवैध धन छिपाने वालों के लिए खतरे की घंटी है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार और आयकर विभाग साल 2016 से पहले किए गए बेनामी लेन-देन के मामलों में भी संपत्तियों को जब्त करने की शक्ति रखते हैं। न्यायमूर्ति की पीठ ने बेनामी संपत्ति अधिनियम के संशोधनों की व्याख्या करते हुए कानून के उन प्रावधानों को सुरक्षा प्रदान की है जो अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों की जब्ती से जुड़े हैं।
यह फैसला उन तमाम लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जिन्होंने अपने आर्थिक प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए अपने ड्राइवर, कुक, घरेलू नौकरों या दूर के रिश्तेदारों के नाम पर भूमि, भवन या नकद निवेश कर रखा था। अब तक कई मामलों में यह तर्क दिया जाता था कि 2016 के कड़े संशोधन पिछली तारीख से लागू नहीं हो सकते, लेकिन न्यायालय ने प्रक्रियात्मक और जब्ती संबंधी नियमों को पिछली तारीख से प्रभावी मानकर जांच एजेंसियों के हाथ मजबूत कर दिए हैं। इस निर्णय के बाद अब आयकर विभाग के पास दो से तीन दशक पुराने संदिग्ध मामलों की फाइलें दोबारा खोलने और उनकी वास्तविक प्रकृति की जांच करने का कानूनी आधार उपलब्ध हो गया है।
न्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि यद्यपि नवंबर 2016 से पहले के मामलों में संशोधित कानून के तहत सात वर्ष की कठोर सजा का प्रावधान लागू नहीं होगा, लेकिन संपत्ति की जब्ती की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से जारी रहेगी। पुराने मामलों में अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान ही प्रभावी रहेगा, परंतु आर्थिक दंड और संपत्ति का सरकारी कब्जे में जाना अब अनिवार्य हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी गहरी चिंता व्यक्त की कि कैसे लोग वसीयत और उत्तराधिकार के दस्तावेजों का उपयोग बेनामी संपत्तियों को कानूनी जामा पहनाने के लिए करते थे। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि लेन-देन का मूल स्वरूप बेनामी है, तो उसे वसीयत के माध्यम से हस्तांतरित करना अवैध माना जाएगा और अदालतें ऐसे मामलों में मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेंगी।
यह ऐतिहासिक फैसला मंजुला और अन्य बनाम डी. ए. श्रीनिवास के मामले की सुनवाई के दौरान आया। इस प्रकरण में एक व्यक्ति ने वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया था, जिसे जांच में भूमि सुधार कानूनों से बचने के लिए रचा गया एक बेनामी षड्यंत्र पाया गया। न्यायालय ने न केवल इस दावे को खारिज किया बल्कि संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर ऐसी समस्त संपत्तियों को सरकारी कब्जे में लिया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव होंगे। अब आयकर विभाग केवल कागजी दस्तावेजों के स्वरूप पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि वह सौदे की तह तक जाकर यह पता लगाएगा कि निवेश किया गया धन वास्तव में किसका था और उसका स्रोत क्या था। जैसा कि कानूनी विशेषज्ञों ने रेखांकित किया है, अब अपराधी भले ही कानून की तकनीकी बारीकियों से बच जाए, लेकिन बेनामी रूप से अर्जित संपत्ति को बचा पाना लगभग असंभव होगा। यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने और बेनामी लेन-देन के माध्यम से फल-फूल रहे समानांतर काले धन के साम्राज्य को ध्वस्त करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।