सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला- CJI सूर्यकांत की दो टूक, कोर्ट के गुंबद पर क्या लगेगा, फैसला न्यायपालिका करेगी|
सुप्रीम कोर्ट परिसर में राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट के गेट पर क्या लगाना है, हम देख लेंगे।
सुप्रीम कोर्ट भवन और सीजेआई सूर्यकांत।
भारतीय न्यायपालिका के सर्वोच्च प्रांगण में राष्ट्रीय प्रतीक के अधिष्ठापन को लेकर दायर की गई एक असामान्य कानूनी याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि अदालत परिसरों की प्रशासनिक व्यवस्था और आंतरिक प्रबंधन से जुड़े निर्णय न्यायपालिका स्वयं लेने में सक्षम है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता को नसीहत दी कि न्यायालय के द्वार पर या उसके गुंबद पर क्या लगाया जाना है, इस प्रशासनिक विषय को अदालत खुद देख लेगी और याचिकाकर्ता को देश की अन्य गंभीर समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
यह पूरा मामला बदरवाद वेणुगोपाल, जिन्हें 'बाबा खतरनाक' के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा दायर की गई रिट याचिका से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दाखिल करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य गुंबद पर राष्ट्रीय प्रतीक स्थापित करने की मांग की थी और इसे 'अदालतों की संवैधानिक पहचान' करार दिया था। इस मामले में पूर्व में 23 मार्च को सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया था कि यह विषय मूल रूप से प्रशासनिक स्तर की जांच और कार्रवाई से संबंधित है, जिसके तहत कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को सक्षम अधिकारी के समक्ष उचित नोट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके पश्चात, प्रशासनिक निर्देशों के क्रियान्वयन की स्थिति जानने के लिए एक अर्जी सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 के अंतर्गत रजिस्ट्रार के समक्ष 3 जुलाई को दाखिल की गई थी। रजिस्ट्रार के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता द्वारा अपील दायर किए जाने के बाद मंगलवार को यह मामला मुख्य न्यायाधीश की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया। पीठ ने मामले की गंभीरता और न्यायक्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए इसमें किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप से साफ इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने दो टूक शब्दों में यह स्थापित किया कि न्यायालय परिसर के भीतर और उसके ढांचे से जुड़े प्रशासनिक मामलों का अधिकार क्षेत्र पूरी तरह से संस्था के अपने प्रशासनिक दायरे में आता है।