सूट पहने विदेश मंत्री एस. जयशंकर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान नई दिल्ली में प्रेस को संबोधित करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

आज की बंटी हुई और ध्रुवीकरण से भरी दुनिया में भारत ने अपनी कूटनीतिक क्षमता का एक शानदार उदाहरण पेश किया है। नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इस सम्मेलन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसे कठिन मुद्दों पर सभी देशों को एक मंच पर लाना और आम सहमति बनाना था, जिसे भारत की अध्यक्षता में सफलताપూర్वक पूरा कर लिया गया।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए इस पूरी सफलता की विस्तार से जानकारी दी और बताया कि कैसे भारी दूरियों और अलग-अलग हितों के बावजूद भारत सभी को साथ लाने में कामयाब रहा। उन्होंने कहा कि शिखर सम्मेलन के दौरान सबसे मुश्किल विषय पश्चिम एशिया का टकराव था, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के बीच गहरे मतभेद बने हुए थे। इन दोनों देशों के अपने-अपने रुख पर अड़े होने के कारण नई दिल्ली घोषणापत्र के मसौदे पर बातचीत आखिरी समय तक चलती रही। इसके बावजूद, शनिवार को ब्रिक्स सदस्य देशों ने यूईए और ईरान के मतभेदों को दूर करते हुए और ईरान पर हुए हमलों के लिए अमेरिका का सीधे तौर पर जिक्र करने से परहेज करते हुए इस घोषणापत्र को अपना लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, तथा अबू धाबी के युवराज मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान जैसे शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में इस ऐतिहासिक घोषणापत्र को मंजूरी मिली। विदेश मंत्री ने रेखांकित किया कि यह एक ऐसा साझा बयान था जिस पर सभी की सहमति बनी। इसमें शांति, सुरक्षा, स्थिरता, लंबे समय तक आपसी समझ, वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला की सुचारु आवाजाही और नागरिकों व नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर जोर दिया गया।

शिखर सम्मेलन के माहौल का जिक्र करते हुए जयशंकर ने बताया कि यहाँ केवल कूटनीतिक समझौते ही नहीं हुए, बल्कि एक ऐसा खुला और सहज वातावरण बना जहाँ वे नेता भी आपस में मिले जो शायद सामान्य परिस्थितियों में एक-दूसरे से नहीं मिल पाते। भारत मंडपम में आयोजित इस सम्मेलन से इतर कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें भी देखने को मिलीं, जिनमें अबू धाबी के युवराज और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना गया। इस सम्मेलन में कुल 32 प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए, जिनमें ब्रिक्स के 11 सदस्य देश, 10 साझेदार देश, 4 क्षेत्रीय संगठन और 7 अंतरराष्ट्रीय संगठन के प्रतिनिधि शामिल थे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत वैश्विक स्तर पर बड़े आयोजनों को कितनी मजबूती से संभाल सकता है।

शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा 'ग्लोबल साउथ' के लिए अर्थव्यवस्था, विकास और प्रौद्योगिकी पर केंद्रित था। सुधार और लचीलेपन जैसे विषयों पर दो मुख्य सत्र आयोजित किए गए, जिन्होंने सभी देशों को एकजुट करने का काम किया। इसके अलावा, आतंकवाद के मुद्दे पर भी ब्रिक्स देशों ने पूरी सख्ती दिखाई। समूह ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम हमले को अस्वीकार्य बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की और आतंकवाद के सभी रूपों—विशेषकर सीमा पार आतंकवाद—के खिलाफ दोहरे मानदंडों को खारिज करते हुए कतई बर्दाश्त न करने (जीरो टॉलरेंस) की नीति पर जोर दिया।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अंत में इस बात पर गर्व जताया कि दुनिया के कई जानकारों का मानना था कि यह शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो पाएगा, लेकिन भारत ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इसे नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न करके यह साबित कर दिया कि मजबूत इच्छाशक्ति और संवाद के जरिए वैश्विक मतभेदों को पाटा जा सकता है।