डमी स्कूल और कोचिंग का बढ़ता गठजोड़: भारतीय शिक्षा व्यवस्था में गहराता संकट

कोचिंग संस्थानों और स्कूलों की मिलीभगत से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक मूल्यों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण।

Update: 2026-05-04 08:10 GMT

डमी स्कूल और कोचिंग माफिया के बढ़ते प्रभाव पर लेख लिखने वाले लेखक किरोड़ी सांकड़ा की फाइल फोटो।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां ज्ञान का मूल उद्देश्य धुंधला पड़ता जा रहा है और उसकी जगह कृत्रिम प्रतिस्पर्धा आधारित बाजार उभरता दिख रहा है। “डमी स्कूल” और कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ता गठजोड़ इस संकट का सबसे गंभीर और खतरनाक रूप बनकर सामने आया है, जो केवल प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर गहराई तक पैठ चुका एक संरचनात्मक विकार है।

डमी स्कूल की अवधारणा स्वयं शिक्षा के मूल सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। इस व्यवस्था में छात्र का नामांकन विद्यालय में होता है, परंतु उसकी उपस्थिति केवल कागजों तक सीमित रहती है। वास्तविक अध्ययन कोचिंग संस्थानों में संचालित होता है, जहां शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि परीक्षा में अधिकतम अंक प्राप्त करना रह जाता है। परिणामस्वरूप, विद्यालय जो कभी व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक विकास के केंद्र थे, अब केवल प्रमाणपत्र जारी करने वाली औपचारिक इकाइयों में परिवर्तित होते जा रहे हैं।

यह समस्या किसी एक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संगठित तंत्र के रूप में विकसित हो चुकी है। कोचिंग संस्थान और स्कूल प्रबंधन की मिलीभगत से “डमी मॉडल” तेजी से फैल रहा है। कोचिंग संस्थान छात्रों को पैकेज के रूप में डमी एडमिशन उपलब्ध कराते हैं, स्कूल बिना वास्तविक शिक्षण के भारी शुल्क वसूलते हैं, और प्रशासनिक तंत्र इस पूरी प्रक्रिया पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में विफल दिखाई देता है। इसके परिणामस्वरूप स्कूलों की कक्षाएं खाली हो रही हैं, जबकि कोचिंग संस्थानों में भीड़ लगातार बढ़ रही है।

यह स्थिति शिक्षा के बाजारीकरण के साथ-साथ नैतिक पतन का संकेत भी देती है। शिक्षा, जो कभी संस्कार और व्यक्तित्व विकास का माध्यम मानी जाती थी, अब एक उत्पाद में बदलती नजर आ रही है। इस “शिक्षा प्रदूषण” ने छात्रों को उनके स्वाभाविक शैक्षणिक वातावरण से दूर कर दिया है। विद्यालयों में मिलने वाला सामाजिक संवाद, अनुशासन, खेल और नैतिक मूल्यों का वातावरण छात्रों के जीवन से लगातार समाप्त हो रहा है। इसका सीधा और गंभीर प्रभाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जहां कोचिंग का दबाव, तीव्र प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अलगाव उन्हें तनाव और अवसाद की ओर धकेल रहे हैं। कई मामलों में यह दबाव आत्मघाती प्रवृत्तियों तक पहुंचता दिखाई देता है, जो समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।

सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि अब तक किए गए प्रयास लक्षणों तक सीमित रहे हैं, जबकि मूल समस्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। बायोमेट्रिक उपस्थिति और औचक निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं कागजी औपचारिकताओं में सिमट कर रह गई हैं, क्योंकि इन्हें लागू करने वाली प्रणाली स्वयं इस तंत्र से प्रभावित होती दिखाई देती है। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक कोई भी सुधारात्मक प्रयास अधूरा रहेगा।

इस समस्या का समाधान केवल कड़े नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है। 11वीं और 12वीं कक्षाओं के शैक्षणिक प्रदर्शन को महत्व देना, बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करना, तथा एक स्वतंत्र और स्वायत्त शिक्षा नियामक संस्था का गठन इस दिशा में आवश्यक कदम माने जा रहे हैं। इसके साथ ही कोचिंग संस्थानों पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है।

यह चुनौती केवल सरकार या संस्थानों तक सीमित नहीं है। अभिभावकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जिन्हें यह समझना होगा कि बच्चों की सफलता केवल अंकों और रैंक से निर्धारित नहीं होती। एक संतुलित, संवेदनशील और नैतिक व्यक्तित्व का निर्माण ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है।

वर्तमान परिस्थितियों में “शिक्षा बचाओ” केवल नारा नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन चुकी है। यदि इस “डमी मॉडल” को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था विरासत में मिलेगी, जो डिग्रियां तो देगी, पर ज्ञान और जीवन मूल्यों से वंचित रखेगी।

लेखक: किरोड़ी सांकड़ा

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