क्रांतिकारी से संत बने भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने ठुकराया था भारत रत्न, अंग्रेजी हुकूमत के आगे नहीं झुके|
क्रांतिकारी से संत बने भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गीताप्रेस की पत्रिका कल्याण की नींव रखी थी।
गोरखपुर के गीता प्रेस और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार की तस्वीर व कल्याण पत्रिका के संदर्भ में।
भारतीय इतिहास में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनका जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं होता है। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे हनुमान प्रसाद पोद्दार, जिन्हें लोग बेहद प्यार और आदर से 'भाईजी' कहकर पुकारते थे। उनका सफर एक क्रांतिकारी से संत बनने और देश की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक चेतना को जगाने का रहा है। उन्होंने दुनिया भर में प्रसिद्ध 'कल्याण' जैसी प्रतिष्ठित आध्यात्मिक पत्रिका की नींव रखी थी। उनके इन्हीं महान कार्यों और देश के प्रति उनके योगदान को सम्मानित करते हुए साल 1992 में भारत सरकार द्वारा उनके नाम पर एक विशेष स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया था।
भाईजी के शुरुआती जीवन पर नजर डालें तो उनका जन्म 18 सितंबर 1892 को राजस्थान के रतनगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम लाल भीमराज अग्रवाल और माता का नाम रिखीबाई था। चूँकि उनके माता-पिता भगवान हनुमान के परम भक्त थे, इसलिए उनका नाम हनुमान प्रसाद रखा गया। युवावस्था में जब वे कलकत्ता (अब कोलकाता) में रह रहे थे, तब वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से जुटने वाले क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। वे रास बिहारी बोस, विपिनचंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और महर्षि अरविंद जैसे महान राष्ट्रनायकों के विचारों से अत्यंत गहरे रूप से प्रभावित थे।
क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी संस्था 'अनुशीलन समिति' से जुड़ गए। उन दिनों उन्होंने कलकत्ता में श्रीमद्भगवद्गीता का एक ऐसा संस्करण प्रकाशित करवाया था, जिसके मुखपृष्ठ पर हाथ में तलवार लिए खड़ी 'भारत माता' का चित्र छपा हुआ था। ब्रिटिश प्रशासन ने इस संस्करण को भड़काऊ मानकर तुरंत जब्त करवा लिया था। इसके अलावा वीर सावरकर की प्रसिद्ध पुस्तक '1857 का स्वातंत्र्य समर' ने भी उनके भीतर देशभक्ति की भावना को और प्रज्वलित किया था। वे महामना मदन मोहन मालवीय के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए चंदा जुटाने के कार्यों में भी आगे रहे। ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें 1916 में गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया था, जहां वे एकांत में भी लगातार लेखन और ईश्वर-भजन करते रहे थे।
जेल से छूटने और क्रांतिकारी जीवन के बाद उनका झुकाव पूरी तरह से अध्यात्म और सनातन धर्म के प्रचार की ओर हो गया। साल 1922 में गोरखपुर में सेठ जयदयाल गोयंदका ने अपने मित्र घनश्यामदास जालान के सहयोग से 'गीता प्रेस, गोरखपुर' की स्थापना की थी, जिसमें भाईजी की भूमिका बेहद अहम रही। आगे चलकर साल 1926 में दिल्ली में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा के एक अधिवेशन के दौरान सेठ घनश्यामदास बिड़ला ने भाईजी से चर्चा करते हुए कहा कि केवल गीता के प्रचार तक सीमित रहने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि सदविचारों के प्रसार के लिए एक उच्च स्तरीय पत्रिका आनी चाहिए।
बिड़ला जी की यह बात भाईजी के मन में घर कर गई। जब उन्होंने गीता प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयंदका से इस पर चर्चा की और पत्रिका के नाम पर विचार हुआ, तो भाईजी ने तुरंत 'कल्याण' नाम सुझाया, जिसका अर्थ था- वह पत्रिका जो मानवमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे। इस प्रकार अगस्त 1925 में प्रकाशक खेमराज श्रीकृष्णदास के सहयोग से 'कल्याण' का प्रवेशांक प्रकाशित हुआ, जिसके पहले ही अंक में महात्मा गांधी का एक विशेष लेख भी छापा गया था। महात्मा गांधी ने भाईजी को यह सलाह दी थी कि इस पत्रिका में कभी भी किसी भी तरह के विज्ञापन या पुस्तक समीक्षाओं को जगह न दी जाए। भाईजी ने जीवनभर इस नियम का पूरी निष्ठा से पालन किया और कभी विज्ञापन नहीं छापे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उन्हें घर-घर गीता पहुँचाने के उनके अद्वितीय योगदान के कारण 'श्रीकृष्ण दूत' कहकर संबोधित करते थे। हाल ही में गीता प्रेस ने 'कल्याण' पत्रिका की पंचवर्षीय सदस्यता योजना को बंद कर दिया है और अब केवल 500 रुपये की सालाना सदस्यता ही उपलब्ध कराई जा रही है, जो इसके इतिहास में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। वर्तमान में इस लोकप्रिय पत्रिका के करीब डेढ़ लाख सदस्य हैं, जिनमें देश के साथ-साथ विदेशी सदस्य भी शामिल हैं।
भाईजी के जीवन का एक और वाकया उनके निडर स्वभाव को भली-भांति दर्शाता है। वर्ष 1936 में जब गोरखपुर में भयंकर बाढ़ आई थी, तब देश के बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू वहां पहुंचे थे। उस समय अंग्रेजी हुकूमत का इतना खौफ था कि किसी भी व्यक्ति में नेहरू जी को अपनी कार देने की हिम्मत नहीं थी। यहाँ तक कि गोरखपुर के अंग्रेज कलेक्टर ने खुली धमकी दी थी कि जो भी व्यक्ति नेहरू को अपनी गाड़ी देगा, उसका नाम विद्रोहियों की सूची में दर्ज कर दिया जाएगा। लेकिन भाईजी इन धिकमियों और अंग्रेजी शासन के दबाव से बिल्कुल नहीं डरे और उन्होंने बेझिझक अपनी कार जवाहरलाल नेहरू को उपयोग के लिए दे दी।
देश की आजादी के बाद उनके त्याग और निष्काम भाव का एक और बड़ा उदाहरण देखने को मिला। जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब डॉक्टर संपूर्णानंद, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के परामर्श पर तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भाईजी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन भाईजी ने अत्यंत विनम्रता के साथ इस बड़े प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका स्पष्ट कहना था कि 'कल्याण' और उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य दुनिया में आध्यात्मिक और नैतिक विचारों का प्रसार करना है, और धर्म का प्रसार कभी भी धन कमाने या बड़े सम्मान पाने का साधन नहीं बनना चाहिए।
जीवनभर मानवता, धर्म, साहित्य और राष्ट्रसेवा में अपना पूरा समय समर्पित करने वाले भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार 26 मार्च 1971 को इस भौतिक संसार को अलविदा कह गए। हालांकि वे अपने पीछे 'गीता प्रेस' और 'कल्याण' जैसी एक ऐसी अमर सांस्कृतिक विरासत छोड़ गए हैं, जो आज भी दुनिया भर में सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान का अलख जगा रही है।