मेट्रो स्टेशनों पर लाइटिंग के नाम पर बीएमसी-बेस्ट को करोड़ों का चूना, जांच की मांग

मुंबई मेट्रो स्टेशनों पर लाइटिंग शुल्क न वसूलने से बीएमसी-बेस्ट को करोड़ों का नुकसान हुआ है। क्या यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है? सभी 26 वार्डों में विशेष ऑडिट और दोषियों पर कार्रवाई की मांग उठी है, 10 दिन में मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट।

Update: 2026-07-08 11:24 GMT

मुंबई के आर्थिक रूप से तंग बृहन्मुंबई महानगरपालिका और बेस्ट उपक्रम में एक बड़े राजस्व घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। मुंबई के विभिन्न मेट्रो स्टेशनों के पास फुटपाथों और बाहरी परिसरों में की गई लाइटिंग के बदले वसूला जाने वाला अनिवार्य वैधानिक शुल्क न लिए जाने से प्रशासन को भारी वित्तीय नुकसान हुआ है। नियमों के अनुसार, मेट्रो प्रशासन द्वारा नियुक्त ठेकेदारों को बीएमसी अधिनियम 1888 और बेस्ट के प्रावधानों के तहत संबंधित वार्ड कार्यालयों में यह शुल्क जमा करना अनिवार्य है, लेकिन इस नियम की अनदेखी की गई है। एक चौंकाने वाले खुलासे में यह बात सामने आई है कि अकेले 'जी/दक्षिण' वार्ड के अंतर्गत आने वाले चार मेट्रो स्टेशनों में से केवल सिद्धिविनायक मंदिर स्टेशन के आसपास की लाइटिंग का ही शुल्क वसूला गया है, जबकि इसी वार्ड के बाकी तीन स्टेशनों से कोई शुल्क नहीं लिया गया।

इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और राजस्व की चोरी को लेकर अब बीएमसी के सभी 26 प्रशासनिक वार्डों में स्थित मेट्रो स्टेशनों की विशेष ऑडिट और गहन जांच की मांग तेज हो गई है। अधिकारियों को अंदेशा है कि यह वित्तीय अनियमितता केवल एक वार्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मुंबई में फैले मेट्रो नेटवर्क में यह खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है। वर्तमान में बीएमसी खुद वित्तीय संकट का सामना कर रही है, जहां राजस्व में गिरावट के कारण विकास कार्यों को पूरा करने के लिए नगर निकाय को अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में कानूनी रूप से मिलने वाले राजस्व को न वसूलना सार्वजनिक धन को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की साजिश की ओर इशारा करता है।

इस पूरे मामले में संबंधित वार्ड के अधिकारियों, बेस्ट प्रशासन, मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन और संबंधित निजी ठेकेदारों के बीच सुनियोजित सांठगांठ होने का संदेह जताया गया है। इस वित्तीय धोखाधड़ी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए दोषियों पर भारतीय न्याय संहिता और अन्य लागू कानूनों के तहत सीधे फौजदारी मुकदमा दर्ज करने की मांग की गई है। इसके साथ ही, जिस भी ठेकेदार ने शुल्क की चोरी की है, उसे तत्काल प्रभाव से ब्लैकलिस्ट करने और भविष्य में किसी भी सरकारी या महानगरपालिका के टेंडर में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है। प्रशासन से मांग की गई है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर अगले 10 दिनों के भीतर या आगामी महापालिका सभा में सभी जनप्रतिनिधियों के समक्ष विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए। जहां भी शुल्क नहीं वसूला गया है, वहां बकाया राशि को भारी ब्याज और जुर्माने के साथ रिकवर किया जाए और नुकसान की भरपाई दोषी अधिकारियों के वेतन से की जाए।

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