राजस्थान पुलिस अकादमी में न्यायपालिका, पुलिस और फोरेंसिक का मंथन, प्रभावी न्याय प्रणाली के लिए बना साझा रोडमैप

राजस्थान पुलिस अकादमी में न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन और फोरेंसिक के 114 प्रतिनिधियों ने नए आपराधिक कानूनों, डिजिटल साक्ष्यों और न्याय प्रणाली को प्रभावी बनाने पर मंथन किया।

Update: 2026-07-27 07:52 GMT

राजस्थान पुलिस अकादमी के मुख्य सभागार में शनिवार, 25 जुलाई 2026 को प्रभावशाली न्याय वितरण हेतु अंतर-संस्थागत समन्वय विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में प्रदेशभर से न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन और विधि-विज्ञान (फोरेंसिक) संस्थानों के कुल 114 प्रतिनिधियों ने भाग लिया और आपराधिक न्याय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।

संगोष्ठी का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रशासन के प्रमुख अंगों के बीच पारस्परिक समझ विकसित करना, भूमिकाओं की स्पष्टता सुनिश्चित करना, साक्ष्य प्रबंधन को मजबूत बनाना, न्यायालयों की अपेक्षाओं की पूर्ति करना तथा मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए साझा रणनीति तैयार करना रहा।

उद्घाटन सत्र में राजस्थान पुलिस अकादमी के निदेशक एवं अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस संजीब कुमार नार्जरी ने कहा कि नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के पारदर्शी क्रियान्वयन की आधारशिला अंतर-विभागीय समन्वय है। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन और अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) के व्यापक उपयोग के माध्यम से पीड़ित को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने पर बल दिया।

अकादमी के अतिरिक्त निदेशक ने समन और वारंट की समय पर तामील, स्थानांतरित जांच अधिकारियों की न्यायालय में उपस्थिति, फोरेंसिक रिपोर्टों में होने वाले विलंब तथा प्रक्रियात्मक कमियों को दूर करने के लिए मानक कार्यप्रणाली तैयार किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम के दौरान आयोजित तीन विषयगत सत्रों में कानूनी विशेषज्ञों ने विभिन्न व्यावहारिक विषयों पर अपने विचार साझा किए। राजस्थान स्टेट कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष अनिल कौशिक, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस एस. सेंगाथिर और एडीपी सुदेश कुमार सत्तवान ने जांच अधिकारियों से न्यायालय की अपेक्षाओं तथा आरोप-पत्र दाखिल करने से पूर्व अभियोजन पक्ष द्वारा की जाने वाली समीक्षा पर विशेष ध्यान केंद्रित किया।

इसके बाद कोटपूतली-बहरोड़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि शर्मा, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस विजय कुमार सिंह और एडीपी अमित जोशी ने अनुसंधान में होने वाली देरी, कमजोर साक्ष्यों, प्रक्रियात्मक त्रुटियों तथा अभियुक्तों के बरी होने के कारणों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए साझा डिजिटल मंच अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

जयपुर जेडीए के जिला एवं सत्र न्यायाधीश महावीर प्रसाद गुप्ता, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस अपराध बिपिन कुमार पाण्डेय तथा पीओ पंकज शर्मा ने इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साक्ष्यों के विधिसम्मत संकलन, अभिरक्षा श्रृंखला की सुरक्षा, केस डायरी लेखन तथा डिजिटल सत्यापन के मानकों पर विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान किया।

संगोष्ठी में पुलिस अनुसंधान की गुणवत्ता सुधारने के लिए 12 प्रमुख बिंदुओं पर विशेष बल दिया गया। इनमें बहुविध दायित्वों के मध्य समयबद्ध अनुसंधान, पूर्व-आरोप पत्र विधिक परामर्श, बाह्य निर्भरताओं का प्रबंधन, समन एवं वारंट की तकनीकी तामील, न्यायालयीन उपस्थिति प्रबंधन, कस्टडी की श्रृंखला और साक्ष्य अखंडता, फोरेंसिक समन्वय, संयुक्त त्रुटि निवारण, दोषमुक्ति मामलों का वस्तुनिष्ठ आकलन, मापने योग्य संस्थागत प्रतिबद्धताएँ, सहयोगात्मक न्याय सुधार तथा मैदानी अनुभव एवं सीख को प्रमुखता दी गई।

संगोष्ठी के समापन पर सभी सहभागी विभागों ने इस बात पर पूर्ण सहमति व्यक्त की कि त्वरित, निष्पक्ष और विश्वसनीय न्याय उपलब्ध कराना किसी एक एजेंसी का दायित्व नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का समेकित प्रयास है। आधुनिक दौर में साक्ष्यों की सत्यता और प्रक्रियात्मक शुद्धता बनाए रखने के लिए जांच अधिकारियों के निरंतर प्रशिक्षण, फोरेंसिक विशेषज्ञों की समयबद्ध सहायता तथा नियमित अंतर-विभागीय समीक्षा बैठकों को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी।

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