राज्यपाल हरिभाऊ बागडे बोले- राजस्थानी केवल भाषा नहीं, राजस्थान की संस्कृति है; सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी केंद्र खोलने के निर्देश

जयपुर में राजस्थान गौरव सम्मान समारोह में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने राजस्थानी भाषा, संस्कृति, नैतिक मूल्यों और विश्वविद्यालयों में राजस्थानी केंद्र खोलने पर महत्वपूर्ण बातें कहीं।

Update: 2026-07-30 13:38 GMT

तस्वीर में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान पोडियम पर खड़े होकर लोगों को संबोधित करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने कहा कि राजस्थानी केवल भाषा नहीं, बल्कि राजस्थान की संस्कृति है। उन्होंने राजस्थानी भाषा में अपना संबोधन प्रारम्भ करते हुए कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध रचना "धरती धोरा री" तथा महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की पंक्तियां “इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥” सुनाईं और उनका अर्थ भी उपस्थित लोगों को बताया।

राज्यपाल गुरुवार को जयपुर के एक निजी होटल में संस्कृति युवा संस्था की ओर से आयोजित "राजस्थान गौरव सम्मान समारोह" को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राजस्थानी बहुत मीठी भाषा है और वह इसे प्यार करते हैं। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के शिक्षा सचिव उनसे मिलने आए थे और एक पत्र देकर कहा था कि राजस्थान के बहुत से लोग महाराष्ट्र में रहते हैं, इसलिए वहां मराठी भाषा के केंद्र खोले जाएंगे तो दोनों प्रदेशों के बीच निकटता बढ़ेगी। इसी संबंध में प्रदेश में मराठी भाषा के केंद्र खोलने का प्रस्ताव रखा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मराठी भाषा अनिवार्य नहीं, बल्कि ऐच्छिक है।

श्री बागडे ने कहा कि राजस्थानी तो राजस्थान की अपनी भाषा है। जब राजस्थानी केंद्र खोलने की बात आई तो उन्होंने तुरंत सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी केंद्र खोलने के लिए भी आदेश जारी कर दिए। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि अच्छी बात है, मराठी केंद्र खोलने के बाद यहां के लोगों का ध्यान राजस्थानी केंद्र खोलने की ओर गया, जबकि इसकी शुरुआत तो बहुत पहले ही हो जानी चाहिए थी।

राज्यपाल ने कहा कि भारत तभी विश्वगुरु बनेगा, जब हमारी संस्कृति और नैतिक मूल्य सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि पेपर लीक जैसे प्रकरण इसलिए होते हैं क्योंकि व्यक्ति नैतिकता से विमुख होने लगा है। उन्होंने संस्कृति और नैतिक मूल्यों को बचाए रखने के लिए समाज के सभी वर्गों से सहभागिता का आह्वान किया।

उन्होंने महाराणा प्रताप के दरबार के लेखक चक्रपाणि मिश्र द्वारा रचित "विश्ववल्लभ" ग्रंथ का उल्लेख करते हुए कहा कि कृषि और जल संरक्षण के क्षेत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। उन्होंने भारत सरकार की ओर से संस्कृति से जुड़े संस्कृत और अन्य भाषाओं के ग्रंथों के डिजिटलीकरण की पहल को भी महत्वपूर्ण बताया।

राज्यपाल ने कहा कि प्राचीन काल में भारत का भूभाग बहुत बड़ा था और म्यांमार, अफगानिस्तान तथा नेपाल भी भारत का ही भाग थे। उन्होंने कहा कि "संस्कृति युवा संस्था" का नाम अत्यंत अच्छा है, क्योंकि भारतीय संस्कृति वास्तव में सदा-सदा के लिए युवा है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में आज भी भारत के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत के प्रति सर्वाधिक आकर्षण है। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्भाग्य है कि बाहरी देश हमारी संस्कृति का सम्मान करते हैं, जबकि हमारे यहां बहुत से लोग इसी संस्कृति का मजाक उड़ाते हैं।

समारोह के दौरान राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों को "राजस्थान गौरव" सम्मान से सम्मानित किया। इस अवसर पर संस्कृति युवा संस्था के संस्थापक अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा, प्रख्यात विधिवेता श्री एच.सी. गणेशिया तथा मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी श्री गोविंद पारीक ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में संस्कृति, भाषा और नैतिक मूल्यों के संरक्षण को समाज की साझा जिम्मेदारी बताते हुए उनके संवर्धन पर विशेष बल दिया गया।

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