निर्मला सीतारमण ने जयपुर में कहा- BRICS देशों के लिए निजी पूंजी जुटाना बड़ी चुनौती
जयपुर में BRICS बैठक के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने निजी पूंजी जुटाने की चुनौतियों और बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने भारत के बुनियादी ढांचे और बजट 2026-27 के लक्षित उपायों की जानकारी दी।
तस्वीर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जयपुर में आयोजित ब्रिक्स सेमिनार के दौरान मंच पर पोडियम से भाषण देते हुए नजर आ रही हैं, जबकि मंच पर अन्य गणमान्य व्यक्ति बैठे हैं।
केन्द्रीय वित्त तथा कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को जयपुर में आयोजित सेमिनार में कहा कि ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के प्रमुख इंजन हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने में इन देशों को एक जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि चुनौती केवल पूंजी की उपलब्धता की नहीं, बल्कि भरोसा, स्थिरता, पूर्वानुमेयता और विश्वसनीय दीर्घकालिक ढांचे तैयार करने की भी है।
श्रीमती निर्मला सीतारमन ने जयपुर में हो रही ब्रिक्स के सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों एवं केन्द्रीय बैंक के गवर्नरों (एफएमसीबीजी) की बैठक के दौरान “द रोल ऑफ द न्यू डेवलपमेंट बैंक इन मोबिलाइजिंग प्राइवेट कैपिटल इन मेंबर कंट्रीज” विषय पर आयोजित सेमिनार में मुख्य भाषण दिया। महामहिम सुश्री डिल्मा रूसेफ ने विशेष संबोधन दिया। कार्यक्रम में वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग (डीईए) की सचिव सुश्री अनुराधा ठाकुर और फिक्की के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट श्री विजय शंकर भी शामिल हुए।
अपने मुख्य भाषण में केन्द्रीय वित्त मंत्री ने बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने के लिए बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ये संस्थाएं निवेश के जोखिम को कम करने, परियोजनाओं को बैंक के लिए आकर्षक बनाने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए श्रीमती सीतारमन ने कहा कि भारत सरकार ने निरंतर सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और उससे जुड़े संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से अपने अवसंरचना इकोसिस्टम को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले की तुलना में सार्वजनिक निवेश में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यह राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स प्रणालियों, डिजिटल अवसंरचना और ऊर्जा नेटवर्कों में उत्पादक राष्ट्रीय परिसंपत्तियां बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है।
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत सरकार का मानना है कि सार्वजनिक पूंजी को निजी निवेश का विकल्प नहीं, बल्कि उसके उत्प्रेरक के तौर पर कार्य करना चाहिए। इसी सिद्धांत के समर्थन में सरकार ने आर्थिक रूप से सीमित लेकिन सामाजिक रूप से वांछनीय परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण यानी वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ), सड़क बुनियादी ढांचे में जोखिम को संतुलित रूप से बांटने के लिए हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (एचएएम), परियोजनाओं की बैंक से ऋण मिलने की योग्यता यानी बैंकेबिलिटी को बेहतर बनाने के लिए क्रेडिट बढ़ाने वाले उपाय किए हैं।
इसके अलावा पूंजी को दोबारा उपयोग करने और दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (इंविट्स), निवेशकों को दीर्घकालिक स्पष्टता प्रदान करने वाली नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन तथा मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी के लिए राष्ट्रीय मास्टर प्लान पीएम गति शक्ति जैसे कदम उठाए गए हैं, जिससे तालमेल और कार्यक्षमता को बेहतर बनाया जा सके।
इसी आधार को आगे बढ़ाते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री ने बताया कि केन्द्रीय बजट 2026-27 में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न लक्षित उपाय किए गए हैं। इनमें नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, नए राष्ट्रीय जलमार्गों को शुरू करना और तटीय कार्गो प्रोत्साहन योजना शामिल हैं।
श्रीमती सीतारमन ने कहा कि ब्रिक्स के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के मुख्य इंजन हैं, वहीं बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने में उन्हें समान संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने रेखांकित किया कि चुनौती केवल पूंजी जुटाने की नहीं है, बल्कि ऐसे भरोसेमंद, स्थिर, पूर्वानुमेय और विश्वसनीय दीर्घकालिक ढांचे तैयार करने की भी है, जो सदस्य देशों में निजी क्षेत्र की निरंतर भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए जरूरी हैं।
अपने मुख्य भाषण के समापन पर केन्द्रीय वित्त मंत्री ने जोर दिया कि विकासात्मक वित्त का भविष्य साझेदारी में निहित है। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय संस्थाओं, राष्ट्रीय सरकारों और निजी क्षेत्र सहित सभी की अपनी-अपनी विशिष्ट खूबियां हैं।
इससे पहले अपने स्वागत भाषण में आर्थिक कार्य विभाग की सचिव श्रीमती अनुराधा ठाकुर ने कहा कि आज का सेमिनार खास तौर पर प्रासंगिक है, क्योंकि विकासात्मक वित्त अब ऐसे दौर में है जहां बड़े पैमाने पर काम करने के साथ-साथ मजबूती भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि पूंजी जुटाना सिर्फ अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर नहीं हो सकता, बल्कि इसे ऐसे ढांचों पर आधारित होना चाहिए जो लंबे समय तक टिके रहें। उन्होंने कहा कि ऐसे ढांचों को मजबूत करने में ही बहुपक्षीय सहयोग से लंबे समय तक चलने वाला लाभ मिल सकता है।
सेमिनार में वरिष्ठ नीति निर्माता, बहुपक्षीय संस्थाओं और निजी कंपनियों के प्रमुख एक साथ आए। इसके बाद आईआरडीएआई के चेयरमैन श्री अजय सेठ, एनडीबी के वाइस-प्रेसिडेंट श्री रोमन सेरोव, सर्ट्रेडिंग के श्री एलेसेंड्रो टेक्सीरा, टेनसेंट के सीनियर एडवाइजर श्री योंगपिंग झाई, टाटा कैपिटल डिकार्बनाइजेशन फंड के श्री पंकज सिंडवानी तथा ब्रिक्स के सदस्य देशों, वित्तीय संस्थाओं, थिंक टैंक और अकादमिक जगत के अन्य प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत पैनल चर्चा हुई। सेमिनार में निजी पूंजी जुटाने के लिए दीर्घकालिक और मजबूत ढांचों तथा बहुपक्षीय साझेदारी की भूमिका पर केंद्रित विमर्श हुआ।