साबरमती रेलवे अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन पर सत्र आयोजित
डॉ. मनोज कुमार देव ने श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं और आधुनिक मनोचिकित्सा के माध्यम से कर्मचारियों को तनाव प्रबंधन के उपाय समझाए।
साबरमती रेलवे अस्पताल में आयोजित जागरूकता सत्र के दौरान मंच से विचार व्यक्त करते डॉ. मनोज कुमार देव और उपस्थित रेलवे कर्मचारी।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर साबरमती रेलवे अस्पताल में रेलवे कर्मचारियों, उनके परिजनों और आश्रितों के मानसिक स्वास्थ्य तथा तनाव प्रबंधन को लेकर जागरूकता एवं संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। “Mental Health & Stress Management in the Light of Bhagavad Gita” विषय पर आयोजित इस सत्र में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं और आधुनिक मनोचिकित्सा की अवधारणाओं के माध्यम से मानसिक संतुलन, भावनात्मक दृढ़ता और कार्यस्थल पर एकाग्रता बनाए रखने के व्यावहारिक उपायों पर चर्चा की गई।
सत्र का संचालन एवं प्रस्तुतीकरण डॉ. मनोज कुमार देव, सहायक मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (मनोचिकित्सा) ने किया। इसमें रेलवे के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों, अस्पताल के स्टाफ और चिकित्सा पेशेवरों सहित लगभग 60 लोगों ने भाग लिया।
डॉ. देव ने बताया कि रेलवे कर्मचारियों, विशेषकर ट्रेन परिचालन और सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों को अनियमित ड्यूटी, शिफ्ट में कार्य, निरंतर सतर्कता और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों के कारण कई बार मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में मानसिक संतुलन, आत्मनियंत्रण और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना महत्वपूर्ण है। उन्होंने आधुनिक मनोचिकित्सा एवं तनाव प्रबंधन की अवधारणाओं को श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं से जोड़ते हुए व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में संतुलन बनाए रखने के तरीके भी समझाए।
श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का उल्लेख करते हुए डॉ. देव ने समझाया कि व्यक्ति को परिणामों की अत्यधिक चिंता करने के बजाय अपने कर्तव्यों और कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने बताया कि रेलवे परिचालन में निर्धारित प्रक्रियाओं, सुरक्षा नियमों और कार्य संबंधी निर्देशों का अनुशासित पालन करते हुए अनावश्यक चिंता से बचना मानसिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
उन्होंने गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोकों के संदर्भ में विचारों, क्रोध और निर्णय क्षमता के बीच संबंध को भी स्पष्ट किया। उनके अनुसार, तनावपूर्ण परिस्थितियों में भावनाओं पर नियंत्रण रखना और परिस्थितियों के प्रति सजग रहना आवश्यक है, क्योंकि मानसिक असंतुलन से एकाग्रता एवं निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। रेलवे जैसे सुरक्षा-संवेदनशील कार्यक्षेत्र में इसका विशेष महत्व है।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और अवसाद से जुड़े सामाजिक संकोच को दूर करने पर जोर देते हुए डॉ. देव ने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्” का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श और मनोचिकित्सकीय सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता एवं अपनी देखभाल की दिशा में सकारात्मक कदम है।
सत्र में संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त एवं गुणवत्तापूर्ण नींद, सकारात्मक दिनचर्या तथा कार्य और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। डॉ. देव ने परिवार के सदस्यों से सहयोगपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण घरेलू वातावरण बनाए रखने की अपील की, ताकि कर्मचारियों को मानसिक शांति और भावनात्मक संबल मिल सके।
जागरूकता सत्र के दौरान कर्मचारियों एवं उनके परिजनों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के शुरुआती संकेत पहचानने, तनाव को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने और आवश्यकता पड़ने पर समय पर विशेषज्ञ सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
सत्र को उपस्थित अधिकारियों, कर्मचारियों, यूनियन प्रतिनिधियों और परिजनों ने सराहा। साबरमती रेलवे अस्पताल में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से भारतीय दार्शनिक परंपरा की शिक्षाओं और आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण के समन्वय से तनाव प्रबंधन तथा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया गया।