कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? आखिर क्यों सिर्फ 48 घंटे में बैन कर दी दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज'?
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' भारत में रिलीज के दो दिन बाद ZEE5 से हटा दी गई। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, 25,000 कथित अवैध अंतिम संस्कारों की जांच, 127 सेंसर कट्स विवाद और केंद्र सरकार की कार्रवाई को लेकर फिर चर्चा में है।
दिलजीत दोसांझ अभिनीत ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम 'पंजाब '95') को भारत में रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दिया गया। केंद्र सरकार के निर्देश पर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2021 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए फिल्म की भारत में उपलब्धता समाप्त कर दी। हालांकि यह फिल्म अब भी ZEE5 ग्लोबल पर अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए उपलब्ध है।
यह फिल्म पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, उनके संघर्ष और उनकी हत्या पर आधारित है। खालड़ा ने 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा कथित रूप से किए गए हजारों अज्ञात शवों के गुप्त अंतिम संस्कार, कथित फर्जी मुठभेड़ों और जबरन गायब किए गए लोगों के मामलों की जांच कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई थी।
फिल्म की रिलीज तक पहुंचने का सफर भी लगातार विवादों से घिरा रहा। थिएटर में रिलीज के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म में 127 से अधिक कट लगाने की मांग की थी। फिल्म निर्माताओं ने इन कट्स को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और अंततः फिल्म को बिना किसी कट के सीधे ZEE5 पर रिलीज किया गया। डिजिटल रिलीज के कुछ ही समय बाद केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए भारत में फिल्म को हटाने का निर्देश दिया।
जसवंत सिंह खालड़ा का जन्म वर्ष 1952 में हुआ था। वे पंजाब के सबसे प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित तौर पर हुए हजारों गैर-न्यायिक हत्याओं, जबरन गायब किए गए लोगों और अवैध अंतिम संस्कारों से जुड़े मामलों की जांच की थी। उनकी जांच में लगभग 25,000 अवैध अंतिम संस्कारों का उल्लेख किया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि लगभग 2,000 ऐसे पुलिसकर्मियों की भी हत्या कर दी गई, जिन्होंने कथित अवैध कार्रवाइयों में शामिल होने से इनकार किया था।
उनकी जांच ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, जिनमें एमनेस्टी इंटरनेशनल भी शामिल है, का ध्यान आकर्षित किया। यह पंजाब में 1990 के दशक के सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकार मामलों में से एक माना जाता है।
उस समय जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर में एक बैंक के निदेशक थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद पंजाब पुलिस को संदिग्धों को हिरासत में लेने के व्यापक अधिकार मिले थे। इसी दौरान पुलिस पर कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ों में लोगों की हत्या करने और सबूत मिटाने के लिए शवों का अंतिम संस्कार करने के आरोप लगे।
खालड़ा एक साथ चार प्रमुख मामलों की जांच कर रहे थे। इनमें बेहला की हिरासत में मौत, सात नागरिकों की मौत से जुड़ा मानव ढाल मामला, पंजाब में 25,000 अज्ञात शवों के कथित अंतिम संस्कार तथा कथित रूप से लगभग 2,000 पुलिसकर्मियों की हत्या का मामला शामिल था। जांच के दौरान उन्होंने दस्तावेज, गवाह और अन्य साक्ष्य एकत्र किए।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में पाया गया कि केवल तरनतारन जिले में ही 2,097 लोगों का कथित रूप से अवैध अंतिम संस्कार किया गया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत रिकॉर्ड में भी उल्लेख किया गया कि उग्रवाद के दौर में कई युवाओं को कथित तौर पर आतंकवादी बताकर मार दिया गया और उनके शवों का बिना रिकॉर्ड के अंतिम संस्कार किया गया।
लापता लोगों की तलाश के दौरान खालड़ा को अमृतसर नगर निगम के रिकॉर्ड मिले, जिनमें कथित रूप से मारे गए और बाद में अंतिम संस्कार किए गए लोगों के नाम, आयु और पते दर्ज थे। आगे की जांच में पंजाब के अन्य जिलों से भी ऐसे हजारों मामलों का विवरण सामने आया।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन पुलिस जिलों में जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अंतिम संस्कार किए गए कुछ लोगों की पहचान संबंधी सूची जारी की थी। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस रिकॉर्ड की वैधता को स्वीकार किया था। खालड़ा का दावा था कि ऐसे मामलों की संख्या 25,000 से अधिक हो सकती है और आज भी अनेक परिवार अपने लापता परिजनों के बारे में आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
जसवंत सिंह खालड़ा के परिवार का स्वतंत्रता आंदोलन से भी संबंध रहा है। उनके दादा हरनाम सिंह गदर आंदोलन के कार्यकर्ता थे और 1914 के प्रसिद्ध कोमागाटा मारू जहाज के यात्रियों में शामिल थे। भारत लौटने पर उन्हें गिरफ्तार कर लाहौर षड्यंत्र मामले में मुकदमे का सामना करना पड़ा था।
खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने भी उनके बाद मानवाधिकार आंदोलनों को आगे बढ़ाया। उनके दो बच्चे नवकिरण कौर और जनमीत सिंह हैं। उनके परिवार में माता-पिता, तीन भाई और पांच बहनें भी शामिल हैं।
6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित अपने घर के बाहर कार धोते समय जसवंत सिंह खालड़ा का कथित तौर पर पंजाब पुलिस के कर्मियों ने अपहरण कर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस की भूमिका की ओर इशारा किया, जबकि पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने या उनके ठिकाने की जानकारी होने से इनकार किया।
1996 में CBI की जांच में ऐसे साक्ष्य मिले जिनके आधार पर नौ पंजाब पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपहरण और हत्या के मामले में कार्रवाई की सिफारिश की गई। हालांकि आरोप तय होने में लगभग दस वर्ष लग गए। 18 नवंबर 2005 को छह पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। दो अधिकारियों को आजीवन कारावास और अन्य चार को सात वर्ष की सजा सुनाई गई। बाद में 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने शेष चार दोषियों की सजा भी बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी। 11 अप्रैल 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने दोषियों की अपील खारिज करते हुए सजा को बरकरार रखा और उस दौर में पंजाब पुलिस पर लगे अत्याचारों को लेकर कड़ी टिप्पणी भी की।
वर्ष 2020 से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और अन्य सिख संस्थाएं जसवंत सिंह खालड़ा को "शहीद भाई जसवंत सिंह खालड़ा" के रूप में श्रद्धांजलि देती रही हैं। वर्ष 2013 में कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ने भी उनके सम्मान में एक प्रस्ताव पारित किया था। अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित फ्रेज़नो शहर में वर्ष 2017 में एक पार्क का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।
दिलजीत दोसांझ अभिनीत इस फिल्म का निर्माण पहले 'घल्लूघारा' नाम से किया गया था, जिसे बाद में 'पंजाब '95' और अंततः 'सतलुज' नाम दिया गया। सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और 127 कट्स की मांग के कारण फिल्म लंबे समय तक रिलीज नहीं हो सकी। अंततः 3 जुलाई 2026 को इसे बिना किसी कट के ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन भारत में रिलीज के दो दिन बाद ही केंद्र सरकार के निर्देश पर इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। यह घटनाक्रम फिल्म, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सेंसरशिप और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विमर्श को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ले आया।