संगीतकार शंकर महादेवन ने ईटोपिया होल्डिंग्स के के. एस. रामकृष्णन के साथ मिलकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों को नए स्वरूप में पेश करने के लिए रेस्तरां मालगुडी की शुरुआत की है।   

गायक और संगीतकार शंकर महादेवन के लिए खाना बनाना केवल शौक नहीं, बल्कि संगीत जितना ही महत्वपूर्ण जुनून है। संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के बाद अब वह दक्षिण भारतीय व्यंजनों के क्षेत्र में अपनी रुचि को आगे बढ़ा रहे हैं। महादेवन ने खुलासा किया है कि दक्षिण भारतीय रेस्तरां मालगुडी शुरू करने का विचार उनके मन में लगभग 20 साल से था। अब इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने के. एस. रामकृष्णन के साथ साझेदारी की है।

महादेवन ने बताया कि उन्हें खाना बनाना बेहद पसंद है और यह उनके लिए संगीत जितना ही अर्थपूर्ण है। उनके अनुसार, इस उद्यम को शुरू करने के लिए सही लोगों और अनुकूल परिस्थितियों का एक साथ आना जरूरी था। जब विचार, स्वभाव और उद्देश्य के बीच तालमेल बना, तब इस योजना को आगे बढ़ाने का रास्ता स्पष्ट हुआ।

मालगुडी को एक नए स्वरूप में विकसित करने की इस पहल में महादेवन ने ईटोपिया होल्डिंग्स के के. एस. रामकृष्णन के साथ हाथ मिलाया है। रामकृष्णन के अनुसार, महादेवन के लिए खाना बनाना सामान्य शौक नहीं, बल्कि एक गंभीर कला है। वह पिछले दस वर्षों से महादेवन को जानते हैं और भोजन के रूप, सुगंध तथा स्वाद के हर पहलू पर उनके ध्यान को देख चुके हैं।

रामकृष्णन ने बताया कि ईटोपिया के अंतर्गत पहले से कई ब्रांड संचालित हो रहे थे। मालगुडी के विचार पर दोबारा चर्चा शुरू होने के बाद महादेवन का जुनून इस परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। वह इसमें केवल रचनात्मक भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि निवेशक के तौर पर भी जुड़े। उनके मुताबिक, ईटोपिया के अंतर्गत अब सात ब्रांड हैं। मालगुडी अधिग्रहित किया गया ब्रांड है, जिसे पिछले एक वर्ष से नए सिरे से विकसित किया जा रहा है।

महादेवन का उद्देश्य दक्षिण भारतीय भोजन को ऐसे अनुभव के रूप में पेश करना है, जिसमें पारंपरिक स्वाद के साथ आधुनिक वातावरण और बेहतर सेवा भी मिले। उन्होंने कहा कि आमतौर पर दक्षिण भारतीय भोजन के लिए लोगों के पास या तो सामान्य उडुपी शैली के भोजनालयों का विकल्प होता है या महंगे रेस्तरां का। इन दोनों के बीच एक ऐसी जगह की कमी थी, जहां लोग साधारण दक्षिण भारतीय भोजन का आनंद आकर्षक वातावरण और सुव्यवस्थित सेवा के साथ ले सकें।

मालगुडी के नए स्वरूप में इसी अंतर को दूर करने का प्रयास किया गया है। यहां साज-सज्जा, व्यंजनों के चयन और सेवा पर विशेष ध्यान दिया गया है। मेन्यू में दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक व्यंजनों के साथ बच्चों के लिए कुछ नए विकल्प भी शामिल किए गए हैं। महादेवन के अनुसार, नए प्रयोग करते समय प्रामाणिक स्वाद से समझौता नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि यहां एक डोसा लगभग 100 वर्ष पुरानी परंपरागत विधि पर आधारित है।

रेस्तरां के मेन्यू में कर्नाटक के मुलबागल कस्बे से जुड़ा मुलबागल डोसा भी शामिल है। बेंगलुरु से लगभग 97 किलोमीटर दूर स्थित मुलबागल के नाम पर पहचाने जाने वाले इस डोसे के किनारे ऊपर की ओर उठे होते हैं, बीच का हिस्सा नरम और फूला हुआ रहता है, जबकि बाहरी किनारे कुरकुरे होते हैं। इसे आलू की भाजी, चटनी और सांभर के साथ परोसा जाता है। इसकी लगभग 100 वर्ष पुरानी परंपरागत विधि में चावल, मूंग दाल, पोहा और मेथी को भिगोकर पारंपरिक तरीके से खमीर उठाया जाता है।

मेन्यू में थट्टे इडली, रसम वड़ा और बेन्ने डोसा भी शामिल हैं। इसके अलावा, इडियप्पम को श्रीलंकाई करी के साथ हॉट पॉट के रूप में परोसा जाता है। बिसी बेले भात को बिबिम्बाप शैली में नए रूप में पेश किया गया है। वहीं, फिल्टर कॉफी और कैपुचीनो के मेल से तैयार कपिचीनो भी मेन्यू का हिस्सा है। इन व्यंजनों के साथ विभिन्न प्रकार के रंगीन और रचनात्मक मॉकटेल भी उपलब्ध हैं।

महादेवन ने अपनी पाक कला के बारे में कहा कि वह सामग्री को अच्छी तरह समझते हैं और खाना बनाने से जुड़ी सामग्री देखते रहते हैं। उनके अनुसार, वह कभी-कभी संगीत से संबंधित सामग्री की तुलना में पाक कला से जुड़ी सामग्री अधिक देखते हैं। उन्होंने भोजन बनाने और संगीत रचने के बीच समानता बताते हुए कहा कि जिस तरह सात सुरों को सही क्रम, अनुपात और भाव के साथ मिलाकर धुन तैयार की जाती है, उसी तरह किसी व्यंजन में सामग्री का चयन और स्वाद का संतुलन महत्वपूर्ण होता है। दोनों में सामंजस्य और लगाव की आवश्यकता होती है।

मालगुडी से महादेवन का जुड़ाव उनके व्यक्तिगत जीवन से भी संबंधित है। उनका परिवार तमिल मूल का है और उनका जन्म केरल के पलक्कड़ से जुड़े तमिल परिवार में हुआ था। उनका पालन-पोषण मुंबई के चेंबूर में हुआ, जहां उनकी कलात्मक यात्रा की शुरुआत हुई। इसी इलाके में उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय और कर्नाटक संगीत सीखा। पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने श्री ललिता वेंकटरमणन के मार्गदर्शन में वीणा बजाना शुरू किया था।

मालगुडी के नए स्वरूप को तैयार करने में महादेवन और रामकृष्णन के परिवारों की अगली पीढ़ी भी सक्रिय रूप से शामिल रही। रेस्तरां के आंतरिक हिस्से में दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक जड़ों को आधुनिक कैफे शैली के साथ जोड़ा गया है। यहां रंगीन भित्तिचित्र, समकालीन साज-सज्जा और कर्नाटक संगीत से प्रेरित ध्वनियों का संयोजन देखने को मिलता है।

रेस्तरां की एक अन्य विशेषता लाइव फिल्टर कॉफी बारिस्ता काउंटर है, जहां चिकमगलूर से मंगाए गए कॉफी बीन्स से विशेष कॉफी तैयार की जाती है। यहां गुड़ से बने लाटे और मालगुडी पिकांटे तथा इंडियानो जैसे दक्षिण भारतीय स्वादों से प्रेरित मॉकटेल भी उपलब्ध हैं।

रामकृष्णन ने बताया कि उनके परिवारों के बच्चे भी इस परियोजना में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी ने रेस्तरां की साज-सज्जा, रंगों, कटलरी और स्थान की बनावट जैसे पहलुओं को नया स्वरूप देने में योगदान दिया है। उनके अनुसार, किसी ब्रांड को लंबे समय तक स्थापित करने में पूरी टीम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि रसोइये से लेकर अन्य कर्मचारियों तक सभी को उसके उद्देश्य और संस्कृति से जुड़ना पड़ता है।

मालगुडी के विस्तार की योजना के तहत बांद्रा में 2025 की चौथी तिमाही और दुबई में 2026 की शुरुआत में नए केंद्र खोलने की योजना बताई गई थी। इसके साथ मालगुडी ऑन द गो नाम से त्वरित सेवा वाला प्रारूप और दक्षिण भारतीय मसाला मिश्रणों, विशेष कॉफी तथा अन्य उत्पादों की खुदरा श्रृंखला शुरू करने की योजना भी सामने रखी गई थी।

महादेवन ने यह भी कहा कि पहले से संचालित सभी त्वरित सेवा वाले केंद्रों को नई पहचान देने की योजना है। इसमें नए रंग, नई डिजाइन शैली और संशोधित मेन्यू शामिल होंगे। उनका कहना है कि ब्रांड को लगातार विकसित करना जरूरी है। महादेवन और रामकृष्णन का साझा लक्ष्य पारंपरिक दक्षिण भारतीय स्वादों को आधुनिक स्वरूप में प्रस्तुत करते हुए इस क्षेत्र में एक व्यापक पहचान बनाना है। महादेवन ने अपने लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि वह दुनिया की सबसे बड़ी दक्षिण भारतीय रेस्तरां श्रृंखला बनाना चाहते हैं।