'मिर्जापुर: द मूवी' के लेखक पुनीत कृष्णा (बाएं) और फिल्म का पोस्टर (दाएं), जिसमें वेब सीरीज को सिनेमाघर तक पहुंचाने की चुनौतियों पर चर्चा की गई है।   

‘मिर्जापुर’ वेब सीरीज की लोकप्रियता के बाद इसे बड़े पर्दे पर लाना निर्माता और लेखक पुनीत कृष्णा के लिए एक बड़ी चुनौती थी। दर्शकों के बीच लोकप्रिय इस अपराध-प्रधान कहानी को फिल्म के रूप में प्रस्तुत करने में असफलता का जोखिम भी था। पुनीत कृष्णा ने 20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक बातचीत में ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की सफलता, वेब सीरीज को फिल्म में बदलने की चुनौतियों, कॉरपोरेट क्षेत्र से पटकथा लेखन तक के अपने सफर और कलाकारों के चयन से जुड़े फैसलों पर बात की।

फिल्म को दर्शकों से मिली प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर पुनीत कृष्णा ने कहा, “बिल्कुल शानदार!” उन्होंने स्वीकार किया कि शुरुआत में टीम के पास इस बात का कोई स्पष्ट खाका नहीं था कि वेब सीरीज को फीचर फिल्म में कैसे बदला जाए। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहली बार वेब सीरीज बनानी शुरू की थी, तब भी उनके पास कोई पूर्व निर्धारित तरीका नहीं था, क्योंकि उस समय भारत में वेब सीरीज की अवधारणा लगभग मौजूद ही नहीं थी। टीम ने सामान्य समझ के आधार पर ऐसी सामग्री तैयार करने की कोशिश की, जिसका दर्शक वास्तव में आनंद ले सकें।

फिल्म बनाने के पीछे की सोच बताते हुए पुनीत ने कहा कि सीरीज को दर्शकों से भरपूर प्यार मिला था। इसलिए टीम ने विचार किया कि क्या इसकी कहानी में ऐसा कुछ है, जिसे सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फीचर फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है और जिसे दर्शक पसंद करेंगे। इसी सोच के साथ फिल्म पर काम किया गया। उन्होंने कहा कि फिल्म को मिली सफलता से पूरी टीम बेहद खुश है।

पुनीत कृष्णा का मनोरंजन जगत तक पहुंचने का सफर भी पारंपरिक रास्ते से अलग रहा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई, एमबीए और कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने के बावजूद फिल्मों के प्रति उनका रुझान बना रहा। वह मूल रूप से निर्देशक बनना चाहते थे और उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में अपना करियर शुरू किया था। उनके मुताबिक, फिल्मों से जुड़कर उन्हें बनाने की इच्छा हमेशा से थी। उन्हें बताया गया था कि सहायक निर्देशक बनना इस लक्ष्य की ओर बढ़ने का एक रास्ता हो सकता है, इसलिए उन्होंने यही रास्ता चुना।

लेखक बनने का मौका उन्हें अप्रत्याशित रूप से मिला। पुनीत ने बताया कि एक परियोजना पर काम करते समय निर्देशक ने उनकी भाषा पर अच्छी पकड़ को पहचाना और उन्हें लेखन करने का सुझाव दिया। निर्देशक ने उनसे उसी फिल्म को लिखने के लिए कहा, जिस पर वह सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे थे। पुनीत के अनुसार, इसी तरह वह अनायास ही लेखक बन गए।

कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने के दौरान भी उन्होंने अपनी रचनात्मक आकांक्षाओं को जीवित रखा। हालांकि, उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि उनके काम को दर्शकों से इतना व्यापक प्यार मिलेगा। उन्होंने कहा कि वह और उनकी टीम खुद को भाग्यशाली मानते हैं और इसके लिए आभारी हैं।

अपने बीते जीवन के बारे में बात करते हुए पुनीत ने कहा कि यदि उन्हें दोबारा वही जीवन जीने का अवसर मिले, तो वह अपनी गलतियों और चुनौतियों सहित उसी जीवन को फिर से चुनेंगे। उनके अनुसार, कठिनाइयां उनकी यात्रा का अभिन्न हिस्सा थीं। उन्होंने अपने परिवार और करीबियों के सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया और कहा कि उनके समर्थन के बिना यह संभव नहीं होता। पुनीत ने कहा कि उन्हें लगता है कि घटनाएं उसी तरह आगे बढ़ीं, जिस तरह उन्हें बढ़ना चाहिए था। उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने में थोड़ी किस्मत की भूमिका को भी स्वीकार किया।

पुनीत की कॉरपोरेट पृष्ठभूमि उनके लेखन में भी दिखाई देती है। उन्होंने बताया कि जब उनकी कहानियों में कारोबारी लेन-देन से जुड़े प्रसंग आते हैं, तो वह तकनीकी विवरणों की सटीकता पर विशेष ध्यान देते हैं। उन्होंने ‘मिर्जापुर’ के कलीन भैया का उदाहरण देते हुए कहा कि जब यह किरदार कालीन, नशीले पदार्थों, आग्नेयास्त्रों या मुनाफे, नुकसान, आपूर्ति और मांग से जुड़े सौदों की बात करता है, तब उनकी कॉरपोरेट पृष्ठभूमि काम आती है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पेशेवर अनुभव का प्रभाव केवल पटकथा तक सीमित नहीं है, बल्कि मनोरंजन उद्योग के लोगों के साथ उनके व्यवहार और काम करने के तरीके पर भी पड़ता है।

लोकप्रिय वेब सीरीज को फिल्म में बदलने के जोखिम पर पुनीत ने स्वीकार किया कि उन्हें शुरुआत से ही इस काम के दबाव का अंदाजा था। उन्होंने कहा कि उन्होंने इस बारे में जरूरत से ज्यादा नहीं सोचा, लेकिन वह जानते थे कि यह एक बड़ा दबाव वाला और जोखिम भरा कदम है। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि दर्शक सीरीज को बहुत पसंद करते हैं और यदि फिल्म सफल नहीं होती, तो इससे सीरीज और उससे जुड़ी विरासत, दोनों को नुकसान पहुंच सकता था। यह आशंका उनके मन में बनी हुई थी।

इसके बावजूद टीम ने फिल्म बनाते समय व्यावसायिक सफलता को प्राथमिक लक्ष्य नहीं बनाया। पुनीत के मुताबिक, उनका उद्देश्य कोई बहुत बड़ी हिट फिल्म बनाना नहीं था, बल्कि अच्छी सामग्री तैयार करना था। उनका मानना था कि यदि फिल्म अच्छी होगी, तो वह स्वाभाविक रूप से सफल हो सकती है। इसी कारण टीम ने व्यावसायिक नतीजों के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया।

‘मिर्जापुर’ की मूल सीरीज के लिए कलाकारों के चयन पर बात करते हुए पुनीत ने अपने सहयोगी गुरु भाई का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब दोनों ने इस परियोजना पर काम शुरू किया, तब वे भी अपने शुरुआती दौर में थे। इससे पहले उनके कुछ प्रोजेक्ट अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाए थे, जिन्हें बॉलीवुड की भाषा में फ्लॉप कहा जा सकता है। उस समय उनका मुख्य उद्देश्य प्रतिभाशाली कलाकारों को तलाशना था।

पुनीत के अनुसार, ओटीटी माध्यम ने उन्हें फिल्मों की तुलना में अलग तरह से कलाकार चुनने की स्वतंत्रता दी। उन्हें शुक्रवार को होने वाले बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों की चिंता नहीं थी, इसलिए बड़े सितारों के पीछे जाने के बजाय ऐसे कलाकारों को चुनना संभव हुआ, जो किरदारों को प्रभावी ढंग से निभा सकें। उन्होंने यह भी समझा कि घर पर कार्यक्रम देखने वाले दर्शक खराब अभिनय से प्रभावित नहीं होते, तो आसानी से दूसरा शो देखना शुरू कर सकते हैं या देखना पूरी तरह बंद कर सकते हैं। उनके लिए किसी भी कार्यक्रम को बंद करके दूसरा विकल्प चुनना आसान होता है।

पुनीत ने कहा कि टीम कलाकारों के चयन को जोखिम भरे प्रयोग के रूप में नहीं देख रही थी। उनका उद्देश्य केवल अच्छे कलाकारों को तलाशना था और उन्हें खुशी है कि उन्हें प्रतिभाशाली कलाकार मिले। उन्होंने प्रत्येक किरदार के लिए उपयुक्त कलाकार मिलने को अपनी टीम की उपलब्धि बताया।

कॉरपोरेट क्षेत्र से सहायक निर्देशक और फिर लेखक बनने तक पुनीत कृष्णा की यात्रा में अनिश्चितता, चुनौतियां और रचनात्मक फैसले शामिल रहे। ‘मिर्जापुर’ की सफलता और ‘मिर्जापुर: द मूवी’ को सिनेमाघरों तक पहुंचाने के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि टीम के पास शुरुआत से कोई तय सफलता-सूत्र नहीं था। कहानी, किरदारों के अनुरूप कलाकारों का चयन, विवरणों पर ध्यान और गुणवत्ता को प्राथमिकता देना इस सफर के अहम पहलू रहे।