जितेंद्र बोले- मौत तक बप्पा के दर्शन करूंगा, खुद को बताया पंजाबी से ज्यादा महाराष्ट्रीय
जितेंद्र पुणे में बप्पा के दर्शन के लिए पहुंचे और महाराष्ट्र से अपने गहरे जुड़ाव को याद किया। अभिनेता ने बचपन की गणपति की यादें, 52 साल से मन रहे गणेशोत्सव और जीवन भर बप्पा के दर्शन की इच्छा बताई।
तस्वीर में अभिनेता जितेंद्र पुणे में भगवान गणेश की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े हुए नजर आ रहे हैं।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता जितेंद्र मंगलवार को भगवान गणेश का आशीर्वाद लेने पुणे पहुंचे। इस दौरान उन्होंने महाराष्ट्र के साथ अपने लंबे जुड़ाव, बचपन की गणपति उत्सव की यादों और फिल्मों में सफलता पाने से पहले बिताए मुश्किल दिनों को याद किया। कार्यक्रम स्थल पर आईएएनएस से बातचीत में जितेंद्र ने कहा कि उन्हें लगता है कि बप्पा खुद उन्हें दर्शन के लिए बुलाते हैं।
जितेंद्र ने कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं होने के बावजूद वह भगवान गणेश के दर्शन का अवसर नहीं छोड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा, “देखिए, नंबर एक, बप्पा मुझे बुलाते हैं, मैं नहीं आता, ये नंबर एक है। और दूसरी बात, उनका प्यार, निंबालकरजी का प्यार, स्नेह, वह मुझे याद करते हैं, मुझे बुलाते हैं, बहुत प्यार से बुलाते हैं। और मुझे उनके लिए आकर अच्छा लगता है। आज मैं ठीक नहीं हूं, लेकिन मैं गलत नहीं कर सकता।”
जब जितेंद्र से पूछा गया कि वह बप्पा से क्या मांगते हैं, तो उन्होंने कहा कि वह जीवन के अंत तक अपने पैरों पर चलने और सक्रिय रहने की प्रार्थना करते हैं। उन्होंने कहा, “मैं मरने तक दो पैरों पर चलना चाहता हूं। मेरी यही प्रार्थना है। मैं मरने तक बप्पा के दर्शन के लिए आना चाहता हूं, चाहे इसके लिए स्ट्रेचर पर ही क्यों न आना पड़े।” बच्चों के लिए अपनी प्रार्थना के बारे में उन्होंने कहा, “बच्चों की शांति, लोगों का प्यार, स्नेह और अच्छा स्वास्थ्य, मैंने बस यही मांगा।”
इसके बाद जितेंद्र ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि गणपति उत्सव उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। उन्होंने बताया कि वह चार मंजिला इमारत में रहते थे, जहां करीब 100 परिवार रहते थे और वहां रहने वाले ज्यादातर लोग महाराष्ट्रीयन और कोंकणी थे। वह उस इमारत में अकेले पंजाबी थे। उन्होंने यह भी बताया कि उनके मुंबई स्थित घर में करीब 52 वर्षों से गणेशोत्सव मनाया जा रहा है।
जितेंद्र ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, “हमारे यहां सैकड़ों परिवार थे, चार मंजिला इमारत थी। हर मंजिल पर 20-25 कमरे थे। तो हम 100 लोग थे। और मैं अकेला पंजाबी था। बाकी सभी महाराष्ट्रीयन और कोंकणी थे। इसलिए मेरे घर में सब कुछ महाराष्ट्रीयन था। मेरी मां भी मराठी बोलती थीं।”
बचपन में गणपति और दूसरे त्योहारों के दौरान मिलने वाली बूंदी को याद करते हुए जितेंद्र ने बताया कि वह बूंदी लेकर अपनी जेब में रख लेते थे और एक-एक करके खाते थे। उन्होंने कहा, “गणपति में, मान लीजिए दिवाली या गणपति। हमें बूंदी मिलती थी। हम बूंदी लेते थे और अपनी जेब में रख लेते थे। हम उसे एक-एक करके खाते थे।”
जितेंद्र ने कहा कि बचपन की ऐसी छोटी-छोटी खुशियां अब बड़े साधनों में भी नहीं मिलतीं। उन्होंने कहा, “अब हमारे पास वह मजा नहीं है। है ना? बचपन में जिन छोटी-छोटी चीजों का हम आनंद लेते थे, अब बड़ी चीजों में भी वह नहीं मिलता।”
अभिनेता ने अपने साधारण शुरुआती जीवन का जिक्र करते हुए बताया कि उनके घर में पंखा होना भी कभी बड़ी सुविधा माना जाता था। उन्होंने मौजूदा मुंबई के एक कमरे वाले फ्लैटों की तुलना करते हुए कहा कि आज हर घर में एसी है, जबकि उनके घर में एक पंखा था। उन्होंने बताया, “अगर मैं यहां देखूं, यहां तक कि मुंबई में भी, एक बेडरूम का फ्लैट है। हर किसी के पास एसी है। हर किसी के घर में एसी है। मेरे घर में पंखा था। पूरी इमारत यह कहते हुए देखने आती थी कि उनके घर में पंखा है।”
जितेंद्र ने बताया कि वह उस इमारत में 17 साल तक रहे। इसके बाद उन्होंने कहा, “उसके बाद, भगवान की कृपा से मैं अभिनेता बन गया।”
अपने बचपन के दिनों की शांति और खुशी को याद करते हुए जितेंद्र ने कहा कि वह समय आज भी उनके दिल में खास जगह रखता है। उन्होंने महाराष्ट्र के साथ अपने गहरे जुड़ाव और महाराष्ट्रीयन जड़ों का भी उल्लेख किया। जितेंद्र ने कहा, “लेकिन वह मजा, शांति, संतुष्टि, मैं अंदर और बाहर से ज्यादा महाराष्ट्रीयन हूं।”
उन्होंने इसकी वजह बताते हुए कहा, “क्योंकि मेरे आसपास बहुत सारे महाराष्ट्रीयन हैं। मैं अपने समय के महाराष्ट्रीयनों की बात कर रहा हूं। मैंने ऐसे अच्छे लोग कभी नहीं मिले। उनमें कभी अहंकार या रवैया नहीं था, लेकिन उनमें बहुत आत्मगौरव और आत्मसम्मान था। वे पूरी तरह आत्मनिर्भर होते थे और कभी किसी पर निर्भर नहीं रहते थे।”
जितेंद्र की पुणे यात्रा के दौरान कही गई बातें उनके बचपन, गणपति उत्सव से जुड़े अनुभवों और महाराष्ट्र के साथ उनके लंबे व्यक्तिगत जुड़ाव को सामने लाती हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बप्पा के दर्शन की उनकी इच्छा जीवन के अंतिम समय तक बनी रहेगी।